Śāṇḍilī–Sumanā-saṃvāda: Sat-strī-samudācāra and Pati-dharma
Conduct of the Virtuous Wife
व्यास उवाच अतिच्छन्दातिवादाभ्यां स्मयो5यं समुपागत: । असत्यं वेदवचनं कस्माद् वेदोडनृतं वदेत्,व्यासजीने कहा--ब्रह्मन! अतिथिको अत्यन्त गौरव प्रदान करते हुए उसकी इच्छाके अनुसार सत्कार करना “अतिच्छन्द' कहलाता है और वाणीद्वारा अतिथिके गौरवका जो प्रकाशन किया जाता है, उसे “अतिवाद' कहते हैं। मुझे यहाँ अतिच्छन््द और अतिवाद दोनों प्राप्त हुए हैं, इसीलिये मेरा यह विस्मय एवं हर्षोल्लास प्रकट हुआ है। (दान और आतिथ्य आदिका महत्त्व वेदोंके द्वारा प्रतिपादित हुआ है।) वेदोंका वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता। भला, वेद क्यों असत्य कहेगा?
vyāsa uvāca | aticchandātivādābhyāṃ smayo 'yaṃ samupāgataḥ | asatyaṃ vedavacanaṃ kasmād vedaḥ anṛtaṃ vadet ||
ویاس نے کہا—“اتِیچّھند اور اتِیواد—ان دونوں کے سبب مجھ پر یہ مسرّت آمیز حیرت طاری ہوئی ہے۔ وید کا قول جھوٹا نہیں ہو سکتا؛ بھلا وید کیوں انرت (باطل) کہے؟”
व्यास उवाच