Śalya’s Objection to Sārathya and Duryodhana’s Conciliation (शल्यमन्यु-प्रशमनम् / Sārathyāṅgīkāra)
बाणजालावूृते व्योम्नि च्छादिते च दिवाकरे | न सम सम्पतते भूम्यां किंचिदप्यन्तरिक्षगम्,बाणोंके जालसे आकाश और सूर्यके ढक जानेपर अन्तरिक्षकी कोई भी वस्तु उस समय पृथ्वीपर नहीं गिरती थी पांचालोंके जो वीर महारथी मरनेसे बच गये थे, उन्हें भागते देख तेजस्वी वीर कर्ण पीछेसे उनपर बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा। उन योद्धाओंके कवच और ध्वज छिन्न-भिन्न हो गये थे। जैसे मध्याह्नकालका सूर्य सम्पूर्ण प्राणियोंकों अपनी किरणोंद्वारा तपाता है, उसी प्रकार महाबली सूतपुत्र अपने बाणोंसे उन शत्रुसैनिकोंको संतप्त करने लगा ।। इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णयुद्धे चतुर्विशो5ध्याय:
sañjaya uvāca |
bāṇajālāvṛte vyomni cchādite ca divākare |
na samaṁ sampatate bhūmyāṁ kiñcid apy antarīkṣagam ||
Wika ni Sañjaya: Nang matakpan ng lambat ng mga palaso ang langit at pati ang araw ay natabingan, wala nang anumang gumagalaw sa himpapawid ang makababa sa lupa nang tuwid at maayos—sapagkat siksik na siksik ang unos ng mga palaso.
संजय उवाच