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Shloka 1

Ballava (Bhīma) Seeks Employment as Royal Cook in Virāṭa’s Court

#::73:.8 #::3...7 () हि 2 7 सप्तमो<्ध्याय: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना वैशम्पायन उवाच (ततस्तु ते पुण्यतमां शिवां शुभां महर्षिगन्धर्वनिषेवितोदकाम्‌ । त्रिलोककान्तामवतीर्य जाह्ववी- मृषीश्च देवांश्व पितृनतर्पयन्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते है--राजन्‌! तदनन्तर पाण्डवोंने परम पवित्र, कल्याणमयी, मंगलस्वरूपा, त्रिभुवनकमनीया गंगामें, जिसके जलका महर्षि और गन्धर्वगण सदा सेवन करते हैं, उतरकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया। वरप्रदानं हानुचिन्त्य पार्थिवो हुताग्निहोत्र: कृतजप्यमज्ूल: । दिशं तथैन्द्रीमभित: प्रपेदिवान्‌ कृताञ्जलिधर्धर्ममुपाह्नयच्छनै: ।। तत्पश्चात्‌ राजा युधिष्ठिर अग्निहोत्र, जप और मंगलपाठ करके धर्मराजके दिये हुए वरदानका चिन्तन करते हुए पूर्व दिशाकी ओर चले और हाथ जोड़कर धीरे-धीरे धर्मराजका स्मरण करने लगे। युधिछिर उवाच वरप्रदानं मम दत्तवान्‌ पिता प्रसन्नचेता वरद: प्रजापति: । जलार्थिनो मे तृषितस्य सोदरा मया प्रयुक्ता विविशुर्जलाशयम्‌ ।। युधिषछ्िर बोले--मेरे पिता प्रजापति धर्म वरदायक देवता हैं। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुझे वर दिया है। मैंने प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने भाइयोंको भेजा था। मेरी प्रेरणासे ही वे एक सरोवरमें उतरे। निपातिता यक्षवरेण ते वने महाहवे वज्रभूृतेव दानवा: | मया च गत्वा वरदो5भितोषितो विवक्षता प्रश्नसमुच्चयं गुरु: ।। परंतु उस वनमें श्रेष्ठ यक्षके रूपमें आये हुए उन धर्मराजने मेरे भाइयोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रधारी इन्द्र महान्‌ संग्राममें दानवोंको मार गिराते हैं। तब मैंने वहाँ जाकर उनके प्रश्नोंका उत्तर दे उन वरदायक गुरुरूप पिताको संतुष्ट किया। स मे प्रसन्नो भगवान्‌ वरं ददौ परिष्वजंश्लवाह तथैव सौहृदात्‌ । वृणीष्व यद्‌ वाउ्छसि पाण्डुनन्दन स्थितो<न्तरिक्षे वरदो5स्मि पश्यताम्‌ ।। उस समय प्रसन्न हो भगवान्‌ धर्मने बड़े स्नेहसे मुझे हृदयसे लगाया और वर देनेके लिये उद्यत हो मुझसे कहा--'पाण्डुनन्दन! तुम जो कुछ चाहते हो, वह मुझसे माँग लो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आकाशमें खड़ा हूँ। मेरी ओर देखो।' स वै मयोक्तो वरद: पिता प्रभु: सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत्‌ । इमे च जीवन्तु ममानुजा: प्रभो वपुश्च॒ रूपं च बल॑ तथाप्तुयु: ।। तब मैंने अपने वरदायक पिता भगवान्‌ धर्मराजसे कहा--'प्रभो! मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे तथा ये मेरे छोटे भाई जीवित हो जायँ और पहले-जैसा रूप, युवावस्था एवं बल प्राप्त कर लें। क्षमा च कीर्तिश्व यथेष्टतो भवेद्‌ व्रतं च सत्यं च समाप्तिरेव च । वरो ममैषोडस्तु यथानुकीर्तितो न तन्मृषा देववरो यदब्रवीत्‌ ।। “हमलोगोंमें इच्छानुसार क्षमा और कीर्ति हो और हम अपने सत्यव्रतको पूर्ण कर लें; यही वर हमें प्राप्त होना चाहिये।” जैसा कि मैंने बताया, वैसा ही वर उन्होंने दिया। देवेश्वर धर्मने जैसा कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्‍्त्वा धर्मात्मा धर्ममेवानुचिन्तयन्‌ । तदैव तत्प्रसादेन रूपमेवाभजत्‌ स्वकम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर उस समय धर्मका ही बार-बार चिन्तन करने लगे। तब धर्मदेवके प्रसादसे उन्होंने तत्काल अपने अभीष्ट स्वरूपको प्राप्त कर लिया। स वै द्विजातिस्तरुणस्त्रिदण्डधृक्‌ कमण्डलूष्णीषधरो5न्वजायत । सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बर: शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद्‌्भुतम्‌ ।। वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये। उनके शरीरपर मँजीठके रंगके सुन्दर लाल वस्त्र शोभा पाने लगे तथा मस्तकपर शिखा दिखायी देने लगी। वे हाथमें कुश लिये अद्भुत रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे। तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथेप्सिता ह्वाभरणाम्बरस्रज: । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्रयफलाभिकाड्क्षिणाम्‌ ।।) राजन! इसी प्रकार उत्तम धर्मके श्रेष्ठ फलकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभी धर्मचारी महात्मा पाण्डवोंको क्षणभरमें उनके अभीष्ट वेशके अनुरूप वस्त्र, आभूषण और माला आदि वस्तुएँ प्राप्त हो गयीं। ततो विराट प्रथमं युधिष्ठिरो राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत्‌ । वैदूर्यरूपान्‌ प्रतिमुच्य काउचना- नक्षान्‌ स कक्षे परिगृह्म वाससा,तदनन्तर वैदूर्यके समान हरी, सुवर्णके समान पीली (त(था लाल और काली) चौसरकी गोटियोंसहित पासोंको कपड़ेमें बाँधकर बगलमें दबाये हुए राजा युधिष्ठिर सबसे पहले राजाके दरबारमें गये। उस समय राजा विराट सभामें बैठे थे

vaiśampāyana uvāca |

tatastu te puṇyatamāṃ śivāṃ śubhāṃ maharṣigandharvaniṣevitodakām |

trilokakāntāmavatīrya jāhnavī-mṛṣīṃśca devāṃśca pitṝnatarpayann ||

ไวศัมปายนะกล่าวว่า ครั้นแล้วเหล่าปาณฑพได้ลงสู่แม่น้ำชาห์นวี (คงคา) อันศักดิ์สิทธิ์ยิ่ง เป็นมงคลและเกื้อกูล มีสายน้ำที่มหาฤษีและคันธรรพ์เสพสรงอยู่เสมอ งดงามเป็นที่รักแห่งสามโลก แล้วได้กระทำตัรปณะบูชา ถวายน้ำอุทิศให้เทพ ฤษี และบรรพชน

ततःthen, thereafter
ततः:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootततः
विराटम्Virāṭa (king)
विराटम्:
Karma
TypeNoun
Rootविराट
FormMasculine, Accusative, Singular
प्रथमम्first (of all)
प्रथमम्:
TypeAdjective
Rootप्रथम
FormNeuter, Accusative, Singular
युधिष्ठिरःYudhiṣṭhira
युधिष्ठिरः:
Karta
TypeNoun
Rootयुधिष्ठिर
FormMasculine, Nominative, Singular
राजाthe king
राजा:
Karta
TypeNoun
Rootराजन्
FormMasculine, Nominative, Singular
सभायाम्in the assembly hall
सभायाम्:
Adhikarana
TypeNoun
Rootसभा
FormFeminine, Locative, Singular
उपविष्टम्seated
उपविष्टम्:
TypeAdjective
Rootउप-विश्
Formक्त, Masculine, Accusative, Singular
आव्रजत्went to, approached
आव्रजत्:
TypeVerb
Rootआ-√व्रज्
FormImperfect, 3, Singular, Parasmaipada
वैदूर्य-रूपान्having the appearance of cat's-eye gem (vaidūrya)
वैदूर्य-रूपान्:
TypeAdjective
Rootवैदूर्यरूप
FormMasculine, Accusative, Plural
प्रतिमुच्यhaving put on / having donned
प्रतिमुच्य:
TypeIndeclinable
Rootप्रति-√मुच्
Formल्यप् (absolutive)
काञ्चनान्golden
काञ्चनान्:
TypeAdjective
Rootकाञ्चन
FormMasculine, Accusative, Plural
अक्षान्dice
अक्षान्:
Karma
TypeNoun
Rootअक्ष
FormMasculine, Accusative, Plural
सःhe
सः:
Karta
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine, Nominative, Singular
कक्षेin the armpit/at the side
कक्षे:
Adhikarana
TypeNoun
Rootकक्ष
FormMasculine, Locative, Singular
परिगृह्यhaving taken/held, having grasped
परिगृह्य:
TypeIndeclinable
Rootपरि-√ग्रह्
Formल्यप् (absolutive)
वाससाwith a cloth/garment
वाससा:
Karana
TypeNoun
Rootवासस्
FormNeuter, Instrumental, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
P
Pāṇḍavas
J
Jāhnavī (Gaṅgā)
M
Mahārṣis
G
Gandharvas
D
Devas
P
Pitṛs (ancestors)

Educational Q&A

Before undertaking consequential action, one should establish oneself in dharma through purification and the fulfillment of obligations—toward gods (devas), sages (ṛṣis), and ancestors (pitṛs). The verse highlights that ethical life is sustained by remembrance, gratitude, and ritual responsibility, not merely by strategy or force.

After a transition in their journey, the Pāṇḍavas enter the Gaṅgā (Jāhnavī) and perform tarpaṇa—water-offerings—to satisfy ṛṣis, devas, and pitṛs. This marks a ritually auspicious preparation for the next phase of their incognito life in the Virāṭa episode.