वैशम्पायन उवाच एवमाख्यायमान तु छन्न॑ सत्रेण पाण्डवम् । वसन्तं तत्र नाज्ञासीद् विराटो वाहिनीपति:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार संकेतपूर्वक बतानेपर भी सेनाओंके स्वामी राजा विराट नपुंसकवेशमें छिपकर वहीं रहनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनको पहचान न सके
ไวศัมปายนะกล่าวว่า “โอ้ชนเมชยะ! แม้จะบอกเป็นนัยเช่นนั้นแล้วก็ตาม พระเจ้าวิราฏ ผู้เป็นจอมทัพ ก็ยังมิอาจรู้จำอรชุน โอรสแห่งปาณฑุ ผู้ซ่อนตนอยู่ที่นั่นในคราบนปุงสกะได้”
वैशम्पायन उवाच