Puṣkara-Tīrtha-Māhātmya and the Phala of Pilgrimage
Nārada–Yudhiṣṭhira; Pulastya–Bhīṣma Transmission
तमृते फाल्गुनं वीर॑ न लभे काम्यके धृतिम् । पश्यामि च दिश: सर्वास्तिमिरेणावृता इव । जिन महाबाहु अर्जुनका आश्रय लेकर पाज्चाल और कुरुवंशके वीर युद्धके लिये उद्यत देवताओंकी सेनाका सामना करनेसे भी भयभीत नहीं होते हैं, जिन महात्माके बाहुबलके भरोसे हम सब लोग युद्धमें अपने शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीका राज्य अपने अधिकारमें आया हुआ मानते हैं, उन वीरवर अर्जुनके बिना हमें काम्यकवनमें धैर्य नहीं प्राप्त हो रहा है। मुझे सारी दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न-सी दिखायी देती हैं | २०-२१३ || ततोअब्रवीत् साश्रुकण्ठो नकुल: पाण्डुनन्दन:,भीमसेनकी यह बात सुनकर पाण्डुनन्दन नकुल अश्रुगदूगदकण्ठसे बोले--
tam ṛte phālgunaṃ vīra na labhe kāmyake dhṛtim | paśyāmi ca diśaḥ sarvāḥ timireṇāvṛtā iva |
ภีมะกล่าวว่า “โอ้วีรบุรุษ หากปราศจากฟัลคุนะ (อรชุน) ข้าย่อมไม่อาจตั้งมั่นในใจได้ ณ ป่ากามยกะนี้เลย และข้าเห็นทิศทั้งปวงประหนึ่งถูกความมืดปกคลุมอยู่”
भीम उवाच