दमयन्त्याः अरण्यविहारः — Damayantī’s Passage through the Wilderness
स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति,उन्हें देखकर (क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान् निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि “यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायँगी”
ครั้นเห็นดังนั้น เจ้าแห่งนิษธะผู้ทรงกำลังก็คิดขึ้นว่า “วันนี้นกเหล่านี้จักเป็นอาหารของเราได้ และขนปีกของมันจักกลายเป็นทรัพย์แก่เรา”
बृहृदश्च उवाच