Sāvitrī–Satyavān Vivāha: Kanyāpradāna and Āśrama-Śīla (सावित्री-सत्यवान्विवाहः)
नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा । अप्यहं शस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना,निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टकं यथा । 'ओ मूढ़! तुम मन-ही-मन जिस वस्तुको पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा। मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वतके शिखरसे कूद पड़ूँगी अथवा जलती हुई आगमें समा जाऊँगी; परंतु” राम-जैसे स्वामीको छोड़कर तुम-जैसे नीच पुरुषका कदापि वरण न करूँगी। जैसे सिंहिनी सियारको नहीं स्वीकार कर सकती, उसी प्रकार मैं तुम्हें नहीं ग्रहण करूँगी'
“เจ้าคนเขลา! ความใคร่ที่เจ้าปรารถนาในใจนั้นไม่มีวันสำเร็จ ข้าจะยกอาวุธแล้วปลิดชีพตนด้วยมือตนเองเสียยังดีกว่า แต่จะไม่ยอมพึ่งพาชายต่ำช้าเช่นเจ้า—ดุจสิงห์นีไม่อาจรับสุนัขจิ้งจอกได้”
मार्कण्डेय उवाच