Yudhiṣṭhira’s Lament on Kāla and Daiva after Draupadī’s Recovery (आरण्यक पर्व, अध्याय २५७)
ततः प्रववृते यज्ञ: प्रभूतार्थ: सुसंस्कृत: । दीक्षितश्नापि गान्धारियथाशास्त्रं यथाक्रमम्,फिर तो उत्तम संस्कारसे युक्त और प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न वह वैष्णवयज्ञ आरम्भ हुआ। गान्धारीनन्दन दुर्योधनने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार विधिपूर्वक उस यज्ञकी दीक्षा ली
แล้วกาลต่อมา ยัญพิธีนั้นก็เริ่มขึ้น อุดมด้วยทรัพย์ทานและประกอบด้วยพิธีกรรมอันประณีต; และโอรสแห่งคานธารี (ทุรโยธนะ) ก็รับทีกษาโดยชอบตามศาสตรา ตามลำดับพิธี
वैशम्पायन उवाच