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Shloka 12

मृगस्वप्नदर्शनम्

The Deer’s Dream-Appeal and the Move to Kāmyaka

(वैशग्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कौन्तेय: पुनर्वाक्यमभाषत । कोपसंरक्तनयन: पूर्ववैरमनुस्मरन्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार भीमसेन पहलेके वैरका स्मरण करते हुए क्रोधसे आँखें लाल करके फिर इस प्रकार बोले। भीम उवाच पुरा जतुगृहेडनेन दग्धुमस्मान्‌ युधिष्ठिर । दुर्बुद्धिर्हि कृता वीर भृशं दैवेन रक्षिता: ।। भीमसेन बोले--वीरवर भैया युधिष्ठिर! आपको याद होगा, पहले इसी दुर्योधनने लाक्षागृहमें हमलोगोंको जलाकर भस्म कर देनेका घृणित विचार किया था; परंतु दैवने हमारी रक्षा की ।। कालकूटं विषं तीक्ष्णं भोजने मम भारत । उप्त्वा गड़ां लतापाशैर्बद्ध्वा च प्राक्षिपत्‌ प्रभो ।। भरतकुलभूषण प्रभो! इसीने मेरे भोजनमें तीव्र कालकूट विष मिला दिया और मुझे लतापाशसे बाँधकर गंगाजीमें फेंक दिया था ।। द्यूतकाले हि कौन्तेय वृजिनानि कृतानि वै । द्रौपद्याश्न परामर्श: केशग्रहणमेव च ।। वस्त्रापहरणं चैव सभामध्ये कृतानि वै । पुरा कृतानां पापानां फल भुद्धक्ते सुयोधन: ।। कुन्तीनन्दन! जूएके समय इसने बड़े-बड़े पाप किये हैं। द्रौपदीका स्पर्श, उसके केशोंको पकड़कर खींचना और भरी सभामें उसे नंगी करनेके लिये उसके वस्त्रोंका अपहरण करना--ये सब दुर्योधनके कुकृत्य हैं। पहलेके किये हुए पापोंका फल आज दुर्योधन भोग रहा है ।। अस्माभिरेव कर्तव्यों धार्तराष्ट्रस्य निग्रह: । अन्येन तु कृतं तच्च मैत्रयमस्माभिरिच्छता ।। उपकारी तु गन्धर्वो मा राजन्‌ विमना भव ।। इस धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको पकड़कर दण्ड देनेका काम तो हमलोगोंको ही करना चाहिये था; परंतु किसी दूसरेने हमारे साथ मैत्रीकी इच्छा रखकर स्वयं ही वह कार्य पूरा कर दिया। राजन! आप उदास न हों; गन्धर्व हमलोगोंका उपकारी ही है ।। वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नन्तरे राजं॑श्रित्रसेनेन वै हृत: । विललाप सुदु:खार्तो द्वियमाण: सुयोधन: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय चित्रसेनद्वारा अपहृत होता हुआ दुर्योधन अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो जोर-जोरसे विलाप करने लगा ।। दुर्योधन उवाच पाण्डुपुत्र महाबाहो पौरवाणां यशस्कर । सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ गन्धर्वेण हृतं बलात्‌ ।। रक्षस्व पुरुषव्यात्र युधिष्ठिर महायश: ।। भ्रातरं ते महाबाहो बद्ध्वा नयति मामयम्‌ | दुःशासनं दुर्विषहं दुर्मुखं दुर्जयं तथा ।। बद्ध्वा हरन्ति गन्धर्वा अस्महारांश्व सर्वश: । अनुधावत मां क्षिप्रं रक्षध्वं पुरुषोत्तमा: ।। वृकोदर महाबाहो धनंजय महायश: । यमौ मामनुधावेतां रक्षार्थ मम सायुधौ ।। कुरुवंशस्य तु महदयश: प्राप्तमीदृशम्‌ । व्यपोहयध्वं गन्धर्वाज्जित्वा वीर्येण पाण्डवा: ।। दुर्योधन बोला--पूरुवंशका यश बढ़ानेवाले समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी पुरुषसिंह महाबाहु पाणए्डुपुत्र युधिष्ठिर! मुझे गन्धर्व बलपूर्वक हरकर लिये जा रहा है। मेरी रक्षा करो। महाबाहो! यह शत्रु तुम्हारे भाई मुझ दुर्योधनको बाँधे लिये जाता है। साथ ही ये सारे गन्धर्व दुःशासन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुर्जय तथा हमारी रानियोंको भी बंदी बनाकर लिये जा रहे हैं। पुरुषोत्तम पाण्डवो! शीघ्र इनका पीछा करो और मेरे प्राण बचाओ। महाबाहु वृकोदर और महायशस्वी धनंजय! मेरी रक्षा करो। दोनों भाई नकुल और सहदेव भी अस्त्र- शस्त्र लिये मेरी रक्षाके लिये दौड़े आवें। पाण्डवो! कुरुवंशके लिये यह बड़ा भारी अयश प्राप्त हो रहा है। तुम अपने पराक्रमसे इन गन्धरवोंको जीतकर मार भगाओ ॥। वैशम्पायन उवाच एवं विलपमानस्य कौरवस्यार्तया गिरा । श्रुत्वा विलापं सम्भ्रान्तो घृणयाभिपरिपष्लुत: ।। युधिष्ठिर: पुनर्वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत्‌ ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार आर्त वाणीमें विलाप करते हुए दुर्योधनका करुण क्रन्दन सुनकर माननीय युधिष्छिर दयासे द्रवित हो गये। उन्होंने पुनः भीमसेनसे कहा-- ।। क इहार्यों भवेत्‌ त्राणमभिधावेति नोदित: । प्राउज्जलिं शरणापन्नं दृष्टवा शत्रुमपि ध्रुवम्‌,“इस जगतमें कौन ऐसा श्रेष्ठ पुरुष है, जो हाथ जोड़कर शरणमें आये हुए शत्रुको भी देखकर और उसके द्वारा की हुई 'दौड़ो-बचाओ' की पुकार सुनकर उसकी रक्षाके लिये दौड़ नहीं पड़ेगा?

vaiśampāyana uvāca |

evam uktas tu kaunteyaḥ punar vākyam abhāṣata |

kopa-saṃrakta-nayanaḥ pūrva-vairam anusmaran ||

ไวศัมปายนะกล่าวว่า ครั้นยุธิษฐิระกล่าวดังนั้นแล้ว ภีมะโอรสแห่งกุนตีก็ตอบอีกครั้ง ดวงตาแดงฉานด้วยโทสะ เมื่อรำลึกถึงความพยาบาทเก่า

कःwho?
कः:
Karta
TypePronoun
Rootकिम्
FormMasculine, Nominative, Singular
इहhere, in this world
इह:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootइह
आर्यःa noble person
आर्यः:
Karta
TypeNoun
Rootआर्य
FormMasculine, Nominative, Singular
भवेत्would be / could be
भवेत्:
TypeVerb
Rootभू
FormOptative (Vidhi-lin), Third, Singular, Parasmaipada
त्राणम्protection, rescue
त्राणम्:
Karma
TypeNoun
Rootत्राण
FormNeuter, Accusative, Singular
अभिधावेतिruns towards (to help)
अभिधावेति:
TypeVerb
Rootअभि-धाव्
FormPresent Indicative, Third, Singular, Parasmaipada
नःof us / our
नः:
TypePronoun
Rootअस्मद्
FormGenitive, Plural
उदितःcalled, addressed, urged
उदितः:
TypeAdjective
Rootउदित
FormMasculine, Nominative, Singular
प्राञ्जलिम्with joined hands (suppliant)
प्राञ्जलिम्:
Karma
TypeAdjective
Rootप्राञ्जलि
FormMasculine, Accusative, Singular
शरणम्refuge
शरणम्:
Karma
TypeNoun
Rootशरण
FormNeuter, Accusative, Singular
आपन्नम्having resorted to, come to
आपन्नम्:
TypeAdjective
Rootआपन्न
FormMasculine, Accusative, Singular
दृष्ट्वाhaving seen
दृष्ट्वा:
TypeVerb
Rootदृश्
FormAbsolutive (Gerund)
शत्रुम्an enemy
शत्रुम्:
Karma
TypeNoun
Rootशत्रु
FormMasculine, Accusative, Singular
अपिeven, also
अपि:
TypeIndeclinable
Rootअपि
ध्रुवम्surely, certainly
ध्रुवम्:
TypeIndeclinable
Rootध्रुव

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
J
Janamejaya
Y
Yudhiṣṭhira
B
Bhīma (Vṛkodara)
K
Kuntī

Educational Q&A

The verse frames a moral tension central to dharma: even when one has strong reasons for anger based on past injuries, righteous conduct requires measured response. Bhīma’s rage and remembrance of prior hostility set up Yudhiṣṭhira’s later insistence on protecting even an enemy who seeks refuge—highlighting compassion, restraint, and the duty to uphold honor beyond personal vendetta.

After Yudhiṣṭhira speaks, Bhīma responds again. The narrator emphasizes Bhīma’s emotional state—his eyes reddened with anger—because he is recalling earlier acts of hostility. This prepares the ensuing exchange where Bhīma enumerates Duryodhana’s past crimes, while Yudhiṣṭhira moves toward the ethical stance of aiding a distressed foe.