अग्निनाम-प्रादुर्भावः प्रायश्चित्त-विधानं च
Agni’s Epithets, Manifestations, and Expiation Procedures
तेषामपि गुणा: सर्वे गुणवृत्ति: परस्परम् | पूर्वपूर्वगुणा: सर्वे क्रमशो गुणिषु त्रिषु,उन शब्द आदि गुणोंके भी अनेक गुण-भेद हैं, क्योंकि इन गुणोंका परस्पर संक्रमण भी देखा जाता है। पहले-पहलेके सभी गुण क्रमश: बादवाले तीन गुणवान् भूतों (अग्नि, जल और पृथ्वी)-में उपलब्ध होते हैं, अर्थात् अग्निमें शब्द, स्पर्श और रूप; जलमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस तथा पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाये जाते हैं
teṣām api guṇāḥ sarve guṇavṛttiḥ parasparam | pūrva-pūrva-guṇāḥ sarve kramaśo guṇiṣu triṣu ||
“แม้ในบรรดาคุณแห่งผัสสะเหล่านั้นก็ยังมีความจำแนกมาก เพราะหน้าที่ของมันปรากฏว่าสอดแทรกถึงกัน และคุณที่มาก่อนย่อมมีอยู่ตามลำดับในมหาภูตสามประการที่เป็น ‘ผู้มีคุณ’ คือ ไฟ น้ำ และดิน: ในไฟมีเสียง สัมผัส และรูป; ในน้ำมีเสียง สัมผัส รูป และรส; ในดินมีเสียง สัมผัส รูป รส และกลิ่น”
व्याध उवाच