अग्निनाम-प्रादुर्भावः प्रायश्चित्त-विधानं च
Agni’s Epithets, Manifestations, and Expiation Procedures
कुशल: सुखदु:खेषु साधूंश्नाप्युपसेवते । तस्य साधुसमारम्भाद् बुद्धिर्धमेषु राजते,इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मकी प्राप्ति कैसे होती है, इसको मुझसे सुनो। जो दुःख और सुखके विवेचनमें कुशल है वह अपनी बुद्धि इन विषयसम्बन्धी दोषोंको पहले ही समझ लेता है। अतः उनसे दूर हटकर श्रेष्ठ पुरुषोंका संग करता है और उस श्रेष्ठसंगसे उसकी बुद्धि धर्ममें लग जाती है
kuśalaḥ sukhaduḥkheṣu sādhūn api upasevate | tasya sādhusamārambhād buddhir dharmeṣu rājate ||
พรานกล่าวว่า “ผู้ใดมีปัญญาแยกแยะสุขและทุกข์ ย่อมแสวงหาสมาคมกับสัตบุรุษ ตั้งแต่เริ่มคบหาคนดีนั้นเอง ความเข้าใจของเขาย่อมส่องสว่างในธรรมะ”
व्याध उवाच