Cyavana’s Tapas, Sukanyā’s Curiosity, and Śaryāti’s Appeasement (च्यवन-सुकन्या-उपाख्यान आरम्भ)
तामाबभाषे कल्याणीं सा चास्य न शृणोति वै । ततः: सुकन्या वल्मीके दृष्टवा भार्गवचक्षुषी,उन्होंने उस कल्याणमयी राजकन्याको पुकारा; परंतु वह (त्रह्मर्षिका कण्ठ दुर्बल होनेके कारण) उनकी आवाज नहीं सुनती थी। उस बाँबीमें मुनिवर च्यवनकी चमकती हुई आँखोंको देखकर उसे बहुत कौतूहल हुआ। उसकी बुद्धिपर मोह छा गया और उसने विवश होकर यह कहती हुई कि “देखूँ यह क्या है?” एक काँटेसे उन्हें छेद दिया। उसके द्वारा आँखें बिंध जानेके कारण परम क्रोधी ब्रह्मर्षि च्यवन अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर तो उन्होंने शर्यातिकी सेनाके मल-मूत्र बंद कर दिये। मल-मूत्रका द्वार बंद हो जानेसे मलावरोधके कारण सारी सेनाको बहुत दुःख होने लगा। सैनिकोंकी ऐसी अवस्था देखकर राजाने सबसे पूछा--“यहाँ नित्य-निरन्तर तपस्यामें संलग्न रहनेवाले वयोवृद्ध महामना च्यवन रहते हैं। वे स्वभावतः बड़े क्रोधी हैं। उनका जानकर या बिना जाने आज किसने अपकार किया है? जिन लोगोंने भी ब्रह्मर्षिका अपराध किया हो, वे तुरंत सब कुछ बता दें, विलम्ब न करें।' ५ 080 तब सम्पूर्ण सैनिकोंने उनसे कहा--“महाराज! हम नहीं जानते कि किसके द्वारा उनका अपराध हुआ है?
tām ābabhāṣe kalyāṇīṃ sā cāsya na śṛṇoti vai | tataḥ su-kanyā valmīke dṛṣṭvā bhārgava-cakṣuṣī ||
ท่านเรียกนางผู้เป็นกัลยาณี แต่เธอมิได้ยินเสียงของท่านเลย ครั้นแล้วสุคนยาเห็นดวงตาอันส่องประกายของฤๅษีภารคพะอยู่ในจอมปลวก
लोगश उवाच
Even unintended harm to a person of great spiritual power can have far-reaching consequences; curiosity without discernment becomes ethical negligence, and rulers must investigate wrongdoing promptly to restore order and dharma.
Sukanyā notices bright eyes in an anthill (Cyavana’s) and, driven by curiosity, pierces them with a thorn. Cyavana becomes enraged and causes a bodily obstruction afflicting King Śaryāti’s army, prompting the king to seek the offender and demand confession.