सुरभि–इन्द्रसंवादः
Surabhi–Indra Dialogue as a Governance Exemplar
अऑडआ हर (0) है 7-2 दशमो< ध्याय: व्यासजीका जाना, मैत्रेयजीका धृतराष्ट्र और दुर्योधनसे पाण्डवोंके प्रति सद्भावका अनुरोध तथा दुर्योधनके अशिष्ट व्यवहारसे रुष्ट होकर उसे शाप देना धृतराष्ट उवाच एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि नो मुने । अहं चैव विजानामि सर्वे चेमे नराधिपा:,धृतराष्ट्र बोले--महाप्राज्ञ मुने! आप जैसा कहते हैं, यही ठीक है। मैं भी इसे ही ठीक मानता हूँ तथा ये सब राजालोग भी इसीका अनुमोदन करते हैं
dhṛtarāṣṭra uvāca | evam etan mahāprājña yathā vadasi no mune | ahaṃ caiva vijānāmi sarve ceme narādhipāḥ ||
ธฤตราษฏระตรัสว่า “เป็นดังนั้นแล โอผู้มีปัญญายิ่ง ดังที่ท่านกล่าวแก่พวกเรา โอฤๅษี ข้าพเจ้าก็เข้าใจเช่นนั้น และบรรดากษัตริย์ทั้งหลายที่อยู่ ณ ที่นี้ก็ยอมรับเห็นพ้องด้วย”
धृतराष्ट उवाच