अदारा-नीति
Crisis Composure) and ‘Jaya’ Śravaṇa (Morale-Instruction
प्राज्ञस्थ नृपतेराशु वृद्धिर्भवति पुत्रक | अभिवर्तति लक्ष्मीस्तं प्राचीमिव दिवाकर:,वत्स! देवताओंसहित ब्राह्मणोंका पूजन तथा अन्यान्य मांगलिक कार्य सम्पन्न करके प्रत्येक कार्यका आरम्भ करनेवाले बुद्धिमान् राजाकी शीघ्र उन्नति होती है। जैसे सूर्य अवश्य ही पूर्वदिशाका आश्रय ले उसे प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार राजलक्ष्मी पूर्वोक्त राजाको सब ओसरसे प्राप्त होकर उसे यश एवं तेजसे सम्पन्न कर देती है
prājñastha nṛpater āśu vṛddhir bhavati putraka | abhivartati lakṣmīs taṃ prācīm iva divākaraḥ ||
ลูกเอ๋ย พระราชาผู้มีปัญญา ซึ่งเริ่มกิจการทั้งปวงหลังจากบูชาพราหมณ์พร้อมด้วยเหล่าเทพ และประกอบมงคลพิธีอื่น ๆ ให้บริบูรณ์ ย่อมรุ่งเรืองโดยเร็ว โชคลาภแห่งราชา (ราชลักษมี) จะหันมาจากทุกทิศแล้วสถิตแก่พระองค์ ประทานเกียรติยศและรัศมี—ดุจพระอาทิตย์ที่ย่อมอาศัยทิศบูรพาแล้วส่องให้สว่าง
पुत्र उवाच