अरण्यवृत्ति-वैराग्योपदेशः | Forest Discipline and the Program of Non-Attachment
दिव: पतत्सु देवेषु स्थाने भ्यश्न महर्षिषु । को हि नाम भवेनार्थी भवेत् कारणतत्त्ववित्,जब देवता भी स्वर्गसे नीचे गिरते हैं और महर्षि भी अपने-अपने स्थानसे भ्रष्ट हो जाते हैं, तब कारण-तत्त्वको जाननेवाला कौन मनुष्य इस जन्म-मरणरूप संसारसे कोई प्रयोजन रखेगा
เมื่อแม้เหล่าเทวะยังตกจากสวรรค์ และมหาฤษีก็ยังคลาดจากฐานะของตน แล้วผู้ใดเล่าที่รู้แก่นแห่งเหตุปัจจัย จะยังยึดถือประโยชน์ใดในสังสาระอันเป็นรูปแห่งเกิดและตายนี้?
युधिछिर उवाच