Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
न चैषामत्ययो राजन् लक्ष्यते प्रभवो न च । अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गति:,राजन! प्रत्येक अवस्थामें इन कलाओंका लय और उद्भव होता रहता है, किंतु दिखायी नहीं देता है; ठीक उसी तरह जैसे दीपककी लौ क्षण-क्षणमें मिटती और उत्पन्न होती रहती है, पर दिखायी नहीं देती
ข้าแต่พระราชา ความดับสูญของกะลาเหล่านี้ก็ไม่ปรากฏ ความเกิดขึ้นก็ไม่ปรากฏ; ในแต่ละภาวะ การเคลื่อนไปของภาวะเป็นดุจเปลวประทีป—ดับและเกิดขึ้นใหม่ทุกขณะ แต่หาได้เห็นชัดไม่.
भीष्य उवाच