तत्र मे रोचते नित्यं॑ पार्थ: साम न विग्रह: । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् बलवत्तरान्,“अतः मुझे तो पाण्डवोंके साथ सदा शान्ति बनाये रखनेकी ही नीति अच्छी लगती है। उनके साथ युद्ध करना मुझे पसंद नहीं है। मैं पाण्डवोंको सदा ही कौरवोंसे अधिक बलवान् मानता हूँ
ธฤตราษฏระตรัสว่า—ฉะนั้นสำหรับเรา ย่อมเห็นควรเสมอที่จะดำเนิน “สามะ” คือทางสันติ มิใช่ “วิครหะ” คือการแตกหักทำศึกกับเหล่าปารถ เพราะเราถือว่าปาณฑพทั้งหลายย่อมมีกำลังเหนือกว่าพวกกุรุอยู่เสมอ
धृतराष्ट उवाच