Adhyāya 45 — Duryodhana’s Distress, Śakuni’s Counsel, and the Summons for Dyūta
क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम | क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति,“कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने-बिगड़ने-वाला है?”
“โอ้ กฤษณะ! หากเจ้าศรัทธาในถ้อยคำของป้าของเจ้า ก็จงยกโทษให้ข้าหรือไม่ยกโทษก็ได้; เจ้าจะกริ้วหรือจะพอใจ—แล้วข้าจะได้หรือเสียอะไรจากเจ้าเล่า?”
वैशम्पायन उवाच