मृषा कृत्वा व्रतं तस्य पापस्य मधुसूदन । पातयिष्ये रथात् कायं शरै: संनतपर्वभि:,“मधुसूदन! जिस दुरात्माने मेरे वधके लिये यह व्रत लिया है कि जबतक अर्जुनको मार न लूंगा, तबतक दूसरोंसे पैर न धुलाऊँगा। उस पापीके इस व्रतको मिथ्या करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसके इस शरीरको रथसे नीचे गिरा दूँगा
mṛṣā kṛtvā vrataṁ tasya pāpasya madhusūdana | pātayiṣye rathāt kāyaṁ śaraiḥ saṁnataparvabhiḥ ||
“โอ้มธุสูทนะ! เราจักทำให้ปณิธานของคนบาปผู้นั้นเป็นโมฆะ แล้วด้วยศรที่มีปล้องคดงอจักฟาดร่างเขาให้ตกจากรถศึก”
संजय उवाच