Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
ब्रह्मोवाच विलय: समयस्यान्ते मरणं जीवितस्य च । इति वित्त वधोपायं कज्चिदेव निशाम्यत ।।) ब्रह्माजीने कहा--दैत्यो! समय पूरा होनेपर सबका लय होता है। जो आज जीवित है, उसकी भी एक दिन मृत्यु होती है। इस बातको अच्छी तरह समझ लो और इन तीनों पुरोंके वधका कोई निमित्त कह सुनाओ। दैत्या ऊचु: वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम् | विचरिष्याम लोके<रस्मिंस्त्वत्प्रसादपुरस्कृता:,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे दैत्य बोले--भगवन्! हम तीनों पुरोंमें ही रहकर इस पृथ्वीपर एवं इस जगतमें आपके कृपा-प्रसादसे विचरेंगे
brahmovāca—vilayaḥ samayasya ante maraṇaṁ jīvitasya ca | iti vitta vadhopāyaṁ kañcid eva niśāmyata ||
พระพรหมตรัสว่า “เมื่อถึงปลายกำหนดกาล ย่อมมีความสลาย (ลยะ) และสำหรับสิ่งที่มีชีวิต ความตายก็เป็นแน่แท้ จงเข้าใจให้ถ่องแท้เถิด แล้วจงกำหนดเหตุหรืออุบายสักประการหนึ่ง ที่จะเป็นเครื่องให้เกิดการทำลายได้”
दुर्योधन उवाच
Time sets a limit to all conditioned existence: dissolution and death are inevitable. Therefore, one should face reality without delusion and act with clear discernment about causes and means (upāya), rather than imagining permanence.
Brahmā instructs the listener to recognize the certainty of death and dissolution when the destined time is complete, and then to identify a concrete means or occasion by which a foretold destruction can occur—framing the next action as dependent on time and proper instrumentality.