Karma-Saṃnyāsa–Karma-Yoga Saṃvāda
Renunciation and the Discipline of Action
सम्बन्ध--इस प्रकार सबको प्रकृतिके अनुसार कर्म करने पड़ते हैं तो फिर कर्मबन्धनसे छूटनेके लिये मनुष्यको क्या करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं-- इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ हास्य परिपन्थिनौ,इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याणमार्ममें विघ्नः करनेवाले महान् शत्रु हैं
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣau vyavasthitau | tayor na vaśam āgacchet tau hy asya paripanthinau ||
ในขอบเขตของอินทรีย์แต่ละอย่างและอารมณ์ของมัน ความยึดติดและความชังตั้งมั่นอยู่ บุคคลไม่พึงตกอยู่ใต้อำนาจของสองสิ่งนั้น เพราะมันเป็นศัตรูผู้ขวางทางแห่งความเกื้อกูลแท้จริง
अजुन उवाच