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Shloka 1

Karma-Saṃnyāsa–Karma-Yoga Saṃvāda

Renunciation and the Discipline of Action

भीष्मपर्वमें छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २६ ॥। नक्शा + (0) आज अनन- $. तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंद्वारा 'असत्‌” और “सत्‌' का विवेचन करके जो यह निश्चय कर लेना है कि जिस वस्तुका परिवर्तन और नाश होता है, जो सदा नहीं रहती, वह असत्‌ है--अर्थात्‌ असत्‌ वस्तुका विद्यमान रहना सम्भव नहीं और जिसका परिवर्तन और नाश किसी भी अवस्थामें किसी भी निमित्तसे नहीं होता, जो सदा विद्यमान रहती है, वह सत्‌ है--अर्थात्‌ सतूका कभी अभाव होता ही नहीं--यही तत्त्वदर्शी पुरुषोंद्वारा उन दोनोंका तत्त्व देखा जाना है। २. पूर्व श्लोकमें जिस “सत्‌” तत्त्वसे समस्त जडवर्गको व्याप्त बतलाया है, उसे 'शरीरी” कहकर तथा शरीरोंके साथ उसका सम्बन्ध दिखलाकर आत्मा और परमात्माकी एकताका प्रतिपादन किया गया है। अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक दृष्टिसे जो भिन्न-भिन्न शरीरोंको धारण करनेवाले, उनसे सम्बन्ध रखनेवाले भिन्न-भिन्न आत्मा प्रतीत होते हैं, वे वस्तुतः भिन्न-भिन्न नहीं हैं, सब एक ही चेतनतत्त्व है; जैसे निद्राके समय स्वप्नकी सृष्टिमें एक पुरुषके सिवा कोई वस्तु नहीं होती, स्वप्रका समस्त नानात्व निद्राजनित होता है, जागनेके बाद पुरुष एक ही रह जाता है, वैसे ही यहाँ भी समस्त नानात्व अज्ञानजनित है, ज्ञानके अनन्तर कोई नानात्व नहीं रहता। ३. इस श्लोकमें छहों विकारोंका अभाव इस प्रकार दिखलाया गया है--आत्माको “अज:” (अजन्मा) कहकर उसमें “उत्पत्ति” रूप विकारका अभाव बतलाया है। “अयं भूत्वा भूय: न भविता' अर्थात्‌ यह जन्म लेकर फिर सत्तावाला नहीं होता, बल्कि स्वभावसे ही सत्‌ है--यह कहकर “अस्तित्व” रूप विकारका, 'पुराण:' (चिरकालीन और सदा एकरस रहनेवाला) कहकर वृद्धि" रूप विकारका, 'शाश्वत:” (सदा एकरूपमें स्थित) कहकर “विपरिणाम” का, “नित्य:” (अखण्ड सत्तावाला) कहकर “क्षय” का और “शरीरे हन्यमाने न हन्यते” (शरीरके नाशसे इसका नाश नहीं होता)--यह कहकर “विनाश” का अभाव दिखलाया है। $. वास्तवमें अचल और अक्रिय होनेके कारण आत्माका किसी भी हालतमें गमनागमन नहीं होता; पर जैसे घड़ेकी एक मकानसे दूसरे मकानमें ले जानेके समय उसके भीतरके आकाशका अर्थात्‌ घटाकाशका भी घटके सम्बन्धसे गमनागमन-सा प्रतीत होता है, वैसे ही सूक्ष्म शरीरका गमनागमन होनेसे उसके सम्बन्धसे आत्मामें भी गमनागमनकी प्रतीति होती है। अतएव लोगोंको समझानेके लिये आत्मामें गमनागमनकी औपचारिक कल्पना की जाती है। २. आत्माको “अविकार्य” कहकर अव्यक्त प्रकृतिसे उसकी विलक्षणताका प्रतिपादन किया गया है। अभिप्राय यह है कि समस्त इन्द्रियाँ और अन्त:करण प्रकृतिके कार्य हैं, वे अपनी कारणरूपा प्रकृतिको विषय नहीं कर सकते, इसलिये प्रकृति भी अव्यक्त और अचिन्त्य है; किंतु वह निर्विकार नहीं है, उसमें विकार होता है और आत्मामें कभी किसी भी अवस्थामें विकार नहीं होता। अतएव प्रकृतिसे आत्मा अत्यन्त विलक्षण है। 3. भगवानका यह कथन उन अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है. जो आत्माका जन्मना-मरना नित्य मानते हैं। उनके मतानुसार जो मरणधर्मा है, उसका जन्म होना निश्चित ही है; क्योंकि उस मान्यतामें किसीकी मुक्ति नहीं हो सकती। जिस वास्तविक सिद्धान्तमें मुक्ति मानी गयी है, उसमें आत्माको जन्मने-मरनेवाला भी नहीं माना गया है, जन्मना-मरना सब अज्ञानजनित है। ३. जैसे मनुष्य लौकिक दृश्य वस्तुओंको मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा इदंबुद्धिसे देखता है, आत्मदर्शन वैसा नहीं है; आत्माका देखना अद्भुत और अलौकिक है। जब एकमात्र चेतन आत्मासे भिन्न किसीकी सत्ता ही नहीं रहती, उस समय आत्मा स्वयं अपने द्वारा ही अपनेको देखता है। उस दर्शनमें ट्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटी नहीं रहती, इसलिये वह देखना आश्वर्यकी भाँति है। २. जितने भी उदाहरणोंसे आत्मतत्त्व समझाया जाता है, उनमेंसे कोई भी उदाहरण पूर्णरूपसे आत्मतत्त्वको समझानेवाला नहीं है। उसके किसी एक अंशको ही उदाहरणोंद्वारा समझाया जाता है; क्योंकि आत्माके सदृश अन्य कोई वस्तु है ही नहीं, इस अवस्थामें कोई भी उदाहरण पूर्णरूपसे कैसे लागू हो सकता है? तथापि बहुत-से आश्वर्यमय संकेतोंद्वारा महापुरुष उसका लक्ष्य कराते हैं, यही उनका आश्चर्यकी भाँति वर्णन करना है। वास्तवमें आत्मा वाणीका अविषय होनेके कारण स्पष्ट शब्दोंमें वाणीद्वारा उसका वर्णन नहीं हो सकता। 3. जिसके अन्तःकरणमें पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकभाव नहीं होता, जिसकी बुद्धि शुद्ध और सूक्ष्म नहीं होती--ऐसा मनुष्य इस आत्मतत्त्वको सुनकर भी संशय और विपरीत भावनाके कारण इसके स्वरूपको यथार्थ नहीं समझ सकता; अतएव इस आत्मतत्त्वका समझना अनधिकारीके लिये बड़ा ही दुर्लभ है। ३. इस श्लोकमें बुद्धिके साथ 'एषा” और “इमाम'--ये दो विशेषण देकर यह बात दिखलायी गयी है कि इस अध्यायके ३८ वें श्लोकमें कही हुई समत्वबुद्धि सांख्ययोगके अनुसार ११ वें श्लोकसे लेकर ३० वें श्लोकतक कही गयी, उसीको अब कर्मयोगके अनुसार कहना आरम्भ करते हैं। २. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि जहाँ कामनायुक्त कर्म होता है, वहीं अच्छे-बुरे फलकी सम्भावना होती है; इसमें कामनाका सर्वथा अभाव है, इसलिये इसमें प्रत्यवाय अर्थात्‌ विपरीत फल भी नहीं होता । ३. भाव यह है कि निष्कामभावका परिणाम संसारसे उद्धार करना है। अतएव वह अपने परिणामको सिद्ध किये बिना न तो नष्ट होता है और न उसका कोई दूसरा फल ही हो सकता है, अन्तमें साधकको पूर्ण निष्काम बनाकर उसका उद्धार कर ही देता है। ३. अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिको योग कहते हैं और प्राप्त वस्तुकी रक्षाका नाम क्षेम है; सांसारिक भोगोंकी कामनाका त्याग कर देनेके बाद भी शरीरनिर्वाहके लिये मनुष्यकी योगक्षेममें वासना रहा करती है, अतएव उस वासनाका भी सर्वथा त्याग करानेके लिये यहाँ अर्जुनको “निर्योगक्षेम” होनेको कहा गया है। २. इस दृष्टान्तका अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्यको अमृतके समान स्वादु और गुणकारी अथाह जलसे भरा हुआ जलाशय मिल जाता है, उसको जैसे जलके लिये (वापी-कूप-तडागादि) छोटे-छोटे जलाशगयोंसे कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही जिसको परमानन्दके समुद्र पूर्णब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, उसको आनन्दकी प्राप्तिके लिये वेदोक्त कर्मोके फलरूप भोगोंसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता। वह सर्वथा पूर्णकाम और नित्यतृप्त हो जाता है। ३. जैसे सरकारके द्वारा लोगोंको आत्मरक्षाके लिये या प्रजाकी रक्षाके लिये अपने पास नाना प्रकारके शस्त्र रखने और उनके प्रयोग करनेका अधिकार दिया जाता है और उसी समय उनके प्रयोगके नियम भी उनको बतला दिये जाते हैं, उसके बाद यदि कोई मनुष्य उस अधिकारका दुरुपयोग करता है तो उसे दण्ड दिया जाता है और उसका अधिकार भी छीन लिया जाता है, वैसे ही जीवको जन्म-मृत्युरूप संसारबन्धनसे मुक्त होनेके लिये और दूसरोंका हित करनेके लिये मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके सहित यह मनुष्यशरीर देकर इसके द्वारा नवीन कर्म करनेका अधिकार दिया गया है। अतः जो इस अधिकारका सदुपयोग करता है, वह तो कर्मबन्धनसे छूटकर परमपदको प्राप्त हो जाता है और जो दुरुपयोग करता है, वह दण्डका भागी होता है तथा उससे वह अधिकार छीन लिया जाता है अर्थात्‌ उसे पुनः सूकर-कूकरादि योनियोंमें ढकेल दिया जाता है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको इस अधिकारका सदुपयोग करना चाहिये। ४. मनुष्य कर्मोका फल प्राप्त करनेमें कभी किसी प्रकार भी स्वतन्त्र नहीं है। उसके कौन-से कर्मका क्या फल होगा और वह फल उसको किस जन्ममें और किस प्रकार प्राप्त होगा--इसका न तो उसको कुछ पता है और न वह अपने इच्छानुसार समयपर उसे प्राप्त कर सकता है अथवा न उससे बच ही सकता है। मनुष्य चाहता कुछ और है और होता कुछ और ही है। ५. मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा किये हुए शास्त्रविहित कर्मोमें और उनके फलमें ममता, आसक्ति, वासना, आशा, स्पृहा और कामना करना ही कर्मफलका हेतु बनना है; क्योंकि जो मनुष्य उपर्युक्त प्रकारसे कर्मोमें और उनके फलमें आसक्त होता है, उसीको उन कर्मोंका फल मिलता है। $. योगमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धिमें ही समत्व रखनेसे काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्येक क्रियाके करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थमें, कर्ममें या उसके फलमें अथवा किसी भी प्राणीमें विषमभाव न रखकर नित्य समभावमें स्थित रहना चाहिये। २. जिसमें ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करके समबुद्धिपूर्वक कर्तव्य-कर्मका अनुष्ठान किया जाता है, उस कर्मयोगका वाचक यहाँ “बुद्धियोगात्‌” पद है; क्योंकि उनतालीसवें श्लोकमें “योगे त्विमां शृणु' अर्थात्‌ अब तुम मुझसे इस बुद्धिको योगमें सुनो, यह कहकर भगवानने कर्मयोगका वर्णन आरम्भ किया है। इसके सिवा इस श्लोकमें फल चाहनेवालोंको कृपण बतलाया गया है और अगले श्लोकमें बुद्धियुक्त पुरुषकी प्रशंसा करके अर्जुनको कर्मयोगके लिये आज्ञा दी गयी है और यह कहा गया है कि बुद्धियुक्त मनुष्य कर्मफलका त्याग करके “अनामय पद' को प्राप्त हो जाता है (गीता २।५१); इस कारण भी यहाँ “बुद्धियोगात” पदका अर्थ कर्मयोग ही है। 3. जन्म-जन्मान्तरमें और इस जन्ममें किये हुए जितने भी पुण्यकर्म और पापकर्म संस्काररूपसे अन्तःकरणमें संचित रहते हैं, उन समस्त कर्मोंको समबुद्धिसे युक्त कर्मयोगी इसी लोकमें त्याग देता है-- अर्थात्‌ इस वर्तमान जन्ममें ही वह उन समस्त कर्मोसे मुक्त हो जाता है। उसका उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता, इसलिये उसके कर्म पुनर्जन्मरूप फल नहीं दे सकते। ४. जहाँ राग-द्वेष आदि क्लेशोंका, शुभाशुभ कर्मोंका, हर्ष-शोकादि विकारोंका और समस्त दोषोंका सर्वथा अभाव है, जो इस प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वधा अतीत है, जो भगवानसे सर्वथा अभिन्न भगवान्‌का परम धाम है, जहाँ पहुँचे हुए मनुष्य वापस नहीं लौटते, उस परम धामको “अनामय पद” कहते हैं। ५. इस लोक और परलोकके जितने भी भोगैश्वर्यादि आजतक देखने, सुनने और अनुभवमें आ चुके हैं, उनका नाम “श्रुत” है और भविष्यमें जो देखे, सुने और अनुभव किये जा सकते हैं, उन्हें 'श्रोतव्य” कहते हैं। उन सबको दु:खके हेतु और अनित्य समझकर जो आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाना है, यही उनसे वैराग्यको प्राप्त होना है। ६. इस लोक और परलोकके भोगैश्वर्य और उनकी प्राप्तिके साधनोंके सम्बन्धमें भाँति-भाँतिके वचनोंको सुननेसे बुद्धिमें विक्षिप्तता आ जाती है; इसके कारण वह एक निश्चयपर निश्चलरूपसे नहीं टिक सकती, अभी एक बातको अच्छी समझती है, तो कुछ ही समय बाद दूसरी बातको अच्छी मानने लगती है। ऐसी विक्षिप्त और अनिश्चयात्मिका बुद्धिको यहाँ “श्रुतिविप्रतिपन्ना बुद्धि" कहा गया है। यह बुद्धिका विक्षेपदोष है। $. शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, मान, प्रतिष्ठा आदि अनुकूल पदार्थोंके बने रहनेकी और प्रतिकूल पदार्थोंके नष्ट हो जानेकी जो रण-द्वेषजनित सूक्ष्म कामना है, जिसका स्वरूप विकसित नहीं होता, उसे “वासना” कहते हैं। किसी अनुकूल वस्तुके अभावका बोध होनेपर जो चित्तमें ऐसा भाव होता है कि अमुक वस्तुकी आवश्यकता है, उसके बिना काम नहीं चलेगा--इस अपेक्षारूप कामनाका नाम 'स्पृहा' है। यह कामनाका वासनाकी अपेक्षा विकसित रूप है। जिस अनुकूल वस्तुका अभाव होता है, उसके मिलनेकी और प्रतिकूलके विनाशकी या न मिलनेकी प्रकट कामनाका नाम “इच्छा” है; यह कामनाका पूर्ण विकसित रूप है और स्त्री, पुत्र, धन आदि पदार्थ यथेष्ट प्राप्त रहते हुए भी जो उनके अधिकाधिक बढ़नेकी इच्छा है, उसको “तृष्णा” कहते हैं। यह कामनाका बहुत स्थूल रूप है। इन सबका सर्वथा त्याग कर देना ही समस्त कामनाओंका भलीभाँति त्याग करना है। २. इससे स्थिरबुद्धि योगीके अन्तःकरण और वाणीमें आसक्ति, भय और क्रोधका सर्वथा अभाव दिखलाया गया है। अभिप्राय यह है कि किसी भी स्थितिमें किसी भी घटनासे उसके अन्तःकरणमें न तो किसी प्रकारकी आसक्ति उत्पन्न हो सकती है, न किसी प्रकारका जरा भी भय हो सकता है और न क्रोध ही हो सकता है। इस कारण उसकी वाणी भी आसक्ति, भय और क्रोधके भावोंसे रहित, शान्‍्त और सरल होती है। 3. इससे यह भाव दिखलाया गया है कि उपर्युक्त शुभाशुभ वस्तुओंमेंसे किसी भी शुभ अर्थात्‌ अनुकूल वस्तुका संयोग होनेपर स्थिरबुद्धि योगीके अन्त:करणमें किंचिन्मात्र भी हर्षका विकार नहीं होता (गीता ५॥। २०)। इस कारण उसकी वाणी भी हर्षके विकारसे सर्वथा शून्य होती है, वह किसी भी अनुकूल वस्तु या प्राणीकी हर्षगर्भित स्तुति नहीं करता। एवं स्थिरबुद्धि योगीका अत्यन्त प्रतिकूल वस्तुके साथ संयोग होनेपर भी उसके अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी द्वेषभाव नहीं उत्पन्न होता। उसका अन्त:ःकरण हरेक वस्तुकी प्राप्तिमें सम, शान्त और निर्विकार रहता है (गीता ५।२०)। इस कारण वह किसी भी प्रतिकूल वस्तु या प्राणीकी द्वेषपूर्ण निन्‍्दा नहीं करता। ३. परमात्मा एक ऐसी अद्भुत, अलौकिक, दिव्य आकर्षक वस्तु है जिसके प्राप्त होनेपर इतनी तल्लीनता, मुग्धता और तन्मयता होती है कि अपना सारा आपा ही मिट जाता है; फिर किसी दूसरी वस्तुका चिन्तन कौन करे? इसीलिये परमात्माके साक्षात्कारसे आसक्तिके सर्वथा निवृत्त होनेकी बात कही गयी है। २. उनसठवें श्लोकमें तो राग-द्वेषका अत्यन्त अभाव बताया गया है और यहाँ राग-द्वेषरहित इन्द्रियोंद्रारा विषयसेवनकी बात कहकर राग-द्वेषके सर्वधा अभावकी साधना बतायी गयी है। तीसरे अध्यायके चालीसवें श्लोकमें इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि--इन तीनोंको ही कामका अधिष्ठान बताया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन्द्रियोंमें राग-द्वेष न रहनेपर भी मन या बुद्धिमें सूक्ष्मरूपसे राग-द्वेष रह सकते हैं; परंतु उनसठवें श्लोकमें “अस्य” पदका प्रयोग करके स्थिरबुद्धि पुरुषमें राग-द्वेषका सर्वथा अभाव बताया गया है। वहाँ केवल इन्द्रियोंमें ही राग-द्वेषके अभावकी बात नहीं है। 3. यद्यपि बाह्य विषयोंका त्याग भी भगवानकी प्राप्तिमें सहायक है, परंतु जबतक इन्द्रियोंका संयम और रागदद्वेषका त्याग न हो, तबतक केवल बाह्द[ विषयोंके त्यागसे विषयोंकी पूर्ण निवृत्ति नहीं हो सकती और न कोई सिद्धि ही प्राप्त होती है तथा ऐसी बात भी नहीं है कि बाह्य विषयका त्याग किये बिना इन्द्रियसंयम हो ही नहीं सकता; क्योंकि भगवान्‌की पूजा, सेवा, जप और विवेक-वैराग्य आदि दूसरे उपायोंसे सहज ही इन्द्रियसंयम हो सकता है। इसी प्रकार इन्द्रियसंयम भी भगवत्प्राप्तिमें सहायक है; परंतु इन्द्रियोंके राग-द्वेषका त्याग हुए बिना केवल इन्द्रियसंयमसे विषयोंकी पूर्णतया निवृत्ति होकर वास्तवमें परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती और ऐसी बात भी नहीं है कि बाह्य विषयत्याग तथा इन्द्रियसंयम हुए बिना इन्द्रियोंके राग-द्वेषका त्याग हो ही न सकता हो। सत्संग, स्वाध्याय और विचारद्वारा सांसारिक भोगोंकी अनित्यताका भान होनेसे तथा ईश्वरकृपा और भजन-ध्यान आदिसे जिसकी इन्द्रियोंके राग-द्वेषका नाश हो गया है, उसके लिये बाह्य विषयोंका त्याग और इन्द्रियसंयम अनायास अपने-आप हो जाता है। जिसका इन्द्रियोंके विषयोंमें राग-द्वेष नहीं है, वह पुरुष यदि बाह्ुरूपसे विषयोंका त्याग न करे तो विषयोंमें विचरण करता हुआ ही परमात्माको प्राप्त कर सकता है; इसलिये इन्द्रियोंका राग-द्वेषसे रहित होना ही मुख्य है। $. वशमें की हुई इन्द्रियोंद्वारा बिना राग-द्वेषके व्यवहार करनेसे साधकका अन्त:करण शुद्ध और स्वच्छ हो जाता है, इस कारण उसमें आध्यात्मिक सुख और शान्तिका अनुभव होता है (गीता १८।३७); उस सुख और शान्तिको “प्रसन्नता” कहते हैं। २. इससे यह दिखलाया गया है कि परम आनन्द और शान्तिके समुद्र परमात्माका चिन्तन न होनेके कारण अयुक्त मनुष्यका चित्त निरन्तर विक्षिप्त रहता है; उसमें राम-द्वेष, काम-क्रोध और लोभ-ईर्ष्या आदिके कारण हर समय जलन और व्याकुलता बनी रहती है। अतएव उसको शान्ति नहीं मिलती। 3. यहाँ नौकाके स्थानमें बुद्धि है, वायुके स्थानमें जिसके साथ मन रहता है, वह इन्द्रिय है, जलाशयके स्थानमें संसाररूप समुद्र है और जलके स्थानमें शब्दादि समस्त विषयोंका समुदाय है। जलमें अपने गन्तव्य स्थानकी ओर जाती हुई नौकाको प्रबल वायु दो प्रकारसे विचलित करती है--या तो उसे पथर्रष्ट करके जलकी भीषण तरंगोंमें भटकाती है या अगाध जलनमें डुबो देती है; इसी प्रकार जिसके मन-इन्द्रिय वशमें नहीं हैं, ऐसा मनुष्य यदि अपनी बुद्धिको परमात्माके स्वरूपमें निश्चल करना चाहता है तो भी उसकी इन्द्रियाँ उसके मनको आकर्षित करके उसकी बुद्धिको दो प्रकारसे विचलित करती हैं। इन्द्रियोंका बुद्धिरूप नौकाको परमात्मासे हटाकर नाना प्रकारके भोगोंकी प्राप्तिका उपाय सोचनेमें लगा देना, उसे भीषण तरंगोंमें भटकाना है और पापोंमें प्रवृत्त करके उसका अधःपतन करा देना, उसे डुबो देना है; परंतु जिसके मन और इन्द्रिय वशमें रहते हैं उसकी बुद्धिको वे विचलित नहीं करते, वरं बुद्धिरूप नौकाको परमात्माके पास पहुँचानेमें सहायता करते हैं। चौंसठवें और पैंसठवें श्लोकोंमें यही बात कही गयी है। ४. श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंके जितने भी शब्दादि विषय हैं, उन विषयोंमें बिना किसी रुकावटके प्रवृत्त हो जाना इन्द्रियोंका स्वभाव है; क्योंकि अनादिकालसे जीव इन इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको भोगता आया है, इस कारण इन्द्रियोंकी उनमें आसक्ति हो गयी है। इन्द्रियोंकी इस स्वाभाविक प्रवृत्तिको सर्वथा रोक देना, उनके विषयलोलुप स्वभावको परिवर्तित कर देना, उनमें विषयासक्तिका अभाव कर देना और मन- बुद्धिको विचलित करनेकी शक्ति न रहने देना--यही उनको उनके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत कर लेना है। इस प्रकार जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई होती हैं, वह पुरुष जब ध्यानकालमें इन्द्रियोंकी क्रियाओंका त्याग कर देता है, उस समय उसकी कोई भी इन्द्रिय न तो किसी भी विषयको ग्रहण कर सकती है और न अपनी सूक्ष्म वृत्तियोंद्वारा मनमें विक्षेप ही उत्पन्न कर सकती है। उस समय वे मनमें तद्गरूप-सी हो जाती हैं और व्युत्थानकालमें जब वह देखना-सुनना आदि इन्द्रियोंकी क्रिया करता रहता है, उस समय वे बिना आसक्तिके नियमितरूपसे यथायोग्य शब्दादि विषयोंका ग्रहण करती हैं। किसी भी विषयमें उसके मनको आकर्षित नहीं कर सकतीं वरं मनका ही अनुसरण करती हैं। स्थितप्रज्ञ पुरुष लोकसंग्रहके लिये जिस इन्द्रियके द्वारा जितने समयतक जिस शास्त्रसम्मत विषयका ग्रहण करना उचित समझता है, वही इन्द्रिय उतने ही समयतक उसी विषयका अनासक्तभावसे ग्रहण करती है; उसके विपरीत कोई भी इन्द्रिय किसी भी विषयको ग्रहण नहीं कर सकती। इस प्रकार जो इन्द्रियोंपर पूर्ण आधिपत्य कर लेना है, उनकी स्वतन्त्रताको सर्वथा नष्ट करके उनको अपने अनुकूल बना लेना है--यही इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे निगृहीत कर लेना है। $. जैसे प्रकाशसे पूर्ण दिनको उल्लू अपने नेत्रदोषसे अन्धकारमय देखता है, वैसे ही अनादिसिद्ध अज्ञानके परदेसे अन्तःकरणरूप नेत्रोंकी विवेक-विज्ञानरूप प्रकाशनशक्तिके आवृत रहनेके कारण अविवेकी मनुष्य स्वयंप्रकाश नित्यबोध परमानन्दमय परमात्माको नहीं देख पाते। उस परमात्माकी प्राप्तिरूप सूर्यके प्रकाशित होनेसे जो परम शान्ति और नित्य आनन्दका प्रत्यक्ष अनुभव होता है, वह वास्तवमें दिनकी भाँति प्रकाशमय है, तो भी परमात्माके गुण, प्रभाव, रहस्य और तत्त्वको न जाननेवाले अज्ञानियोंके लिये रात्रिके समान है। उसीमें स्थितप्रज्ञ पुरुषका जो उस सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपको प्रत्यक्ष करके निरन्तर स्थित रहना है, यही उसका उस सम्पूर्ण प्राणियोंकी रात्रिमें जागना है। २. जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यका स्वप्नके जगत्‌्से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता, वैसे ही परमात्मतत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीके अनुभवमें एक सच्चिदानन्दघन परमात्मासे भिन्न किसी भी वस्तुकी सत्ता नहीं रहती। वह ज्ञानी इस दृश्य जगतके स्थानमें इसके अधिष्ठानरूप परमात्मतत्त्वको ही देखता है, अतएव उसके लिये समस्त सांसारिक भोग और विषयानन्द रात्रिके समान हैं। 3. किसी भी जड वस्तुकी उपमा देकर स्थितप्रज्ञ पुरुषकी वास्तविक स्थितिका पूर्णतया वर्णन करना सम्भव नहीं है, तथापि उपमाद्वारा उस स्थितिके किसी अंशका लक्ष्य कराया जा सकता है। अतः समुद्रकी उपमासे यह भाव समझना चाहिये कि जिस प्रकार समुद्र 'आपूर्यमाण” यानी अथाह जलसे परिपूर्ण हो रहा है, उसी प्रकार स्थितप्रज्ञ अनन्त आनन्दसे परिपूर्ण है; जैसे समुद्रको जलकी आवश्यकता नहीं है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ पुरुषको भी किसी सांसारिक सुख-भोगकी तनिकमात्र भी आवश्यकता नहीं है, वह सर्वथा आप्तकाम है। जिस प्रकार समुद्रकी स्थिति अचल है, भारी-से-भारी आँधी-तूफान आनेपर या नाना प्रकारसे नदियोंके जलप्रवाह उसमें प्रविष्ट होनेपर भी वह अपनी स्थितिसे विचलित नहीं होता, मर्यादाका त्याग नहीं करता, उसी प्रकार परमात्माके स्वरूपमें स्थित योगीकी स्थिति भी सर्वथा अचल होती है, बड़े- से-बड़े सांसारिक सुख-दुःखोंका संयोग-वियोग होनेपर भी उसकी स्थितिमें जरा भी अन्तर नहीं पड़ता, वह सच्चिदानन्दघन परमात्मामें नित्य-निरन्तर अटल और एकरस स्थित रहता है। $. मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके सहित शरीरमें जो साधारण अज्ञानी मनुष्योंका आत्माभिमान रहता है, जिसके कारण वे शरीरको ही अपना स्वरूप मानते हैं, अपनेको शरीरसे भिन्न नहीं समझते, उस देहाभिमानका नाम अहंकार है; उससे सर्वथा रहित हो जाना ही “अहंकाररहित” हो जाना है। मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके सहित शरीरको, उसके साथ सम्बन्ध रखनेवाले स्त्री, पुत्र, भाई और बन्धु- बान्धवोंको तथा गृह, धन, ऐश्वर्य आदि पदार्थोको, अपने द्वारा किये जानेवाले कर्मोंकोी और उन कर्मोंके फलरूप समस्त भोगोंको साधारण मनुष्य अपना समझते हैं; इसी भावका नाम “ममता” है और इससे सर्वथा रहित हो जाना ही “ममतारहित' हो जाना है। किसी अनुकूल वस्तुका अभाव होनेपर मनमें जो ऐसा भाव होता है कि अमुक वस्तुकी आवश्यकता है, उसके बिना काम न चलेगा, इस अपेक्षाका नाम स्पृह्ाा है और इससे सर्वथा रहित हो जाना ही '*स्पृहारहित' होना है। अहंकार, ममता और स्पृहा--इन तीनोंसे उपर्युक्त प्रकारसे रहित होकर अपने वर्ण, आश्रम, प्रकृति और परिस्थितिके अनुसार केवल लोकसंग्रहके लिये इन्द्रियोंके विषयोंमें विचरना अर्थात्‌ देखना-सुनना, खाना-पीना, सोना-जागना आदि समस्त शास्त्रविहित चेष्टा करना ही समस्त कामनाओंका त्याग करके अहंकार, ममता और स्पृहासे रहित होकर विचरना है। २. अर्जुनके पूछनेपर पचपनवें श्लोकसे यहाँतक स्थितप्रज्ञ पुरुषकी जिस स्थितिका जगह-जगह वर्णन किया गया है, उसमें सर्वथा निर्विकार और निश्चलभावसे नित्य-निरन्तर निमग्न रहना ही उस स्थितिको प्राप्त होना है। ईश्वर क्या है? संसार क्या है? माया क्या है? इनका परस्पर क्या सम्बन्ध है? मैं कौन हूँ? कहाँसे आया हूँ? मेरा क्या कर्तव्य है? और क्या कर रहा हूँ?-आदि विषयोंका यथार्थ ज्ञान न होना ही मोह है, यह मोह जीवको अनादिकालसे है, इसीके कारण यह इस संसारचक्रमें घूम रहा है। उपर्युक्त ब्राह्मी स्थितिको प्राप्त पुरुषका यह अनादिसिद्ध मोह समूल नष्ट हो जाता है, अतएव फिर उसकी उत्पत्ति नहीं होती। सप्तविशोड्ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायां तृतीयो<ध्याय:) ज्ञानयोग और कर्मयोग आदि समस्त साधनोंके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन एवं स्वधर्मपालनकी महिमा तथा कामनिरोधके उपायका वर्णन सम्बन्ध-- दूसरे अध्यायमें भगवान्‌ने 'अशोच्यानन्व-शोचस्त्वम्‌” (गीता २/११/ से लेकर <देही नित्य-मवध्योउयम्‌” (गीता २/३०/ तक आत्मतत्त्वका निरूपण करते हुए सांख्ययोगका प्रतिपादन किया और <बुद्धियांगे त्विमां शुणु” (गीता २/३९/ से लेकर 'तदा योगगवाप्स्यसि” (गीता २/५३) तक समबुद्धिरूप कर्मयोगका वर्णन किया। इसके पश्चात्‌ चौवनवें शलोकसे अध्यायकी समाप्ति-पर्यन्त अजुनके पूछनेपर भगवान्‌ने समबुद्धिरूप कर्मयोगके द्वारा परमेश्वरको प्राप्त हुए स्थितप्रज्ञ सिद्ध पुरुषके लक्षण; आचरण और महत्त्वका प्रतिपादन किया। वहाँ कर्मयोगयकी महिमा कहते हुए भगवान्‌ने सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकोंगें कर्मगोगयका स्वरूप बतलाकर अजुनिको कर्म करनेके लिये कहा; उनचासवेंगें समबुद्धिरूप कर्मयोगकी अपेक्षा सकामकर्मका स्थान बहुत ही नीचा बतलाया, पचासवेंगें समबुद्धियुक्त पुरुषकी प्रशंसा करके अर्जुनकों कर्मयोगमें लगनेके लिये कहा; इक्यावनवेंगें समबुद्धियुक्त ज्ञानी पुएषको अनामय पदकी प्राप्ति बतलायी। इस प्रसंगको युनकर अर्जुन उसका यथार्थ अभिप्राय निश्चित नहीं कर सके। बुद्धि शब्दका अर्थ ज्ञान! मान लेनेसे उन्हें भ्रम हो गया; भगवान्‌के वचनोंगें 'कर्म'की अपेक्षा ज्ञान की प्रशंसा प्रतीत होने लगी एवं वे वचन उनको स्पष्ट न दिखायी देकर मिले हुए-से जान पड़ने लगे। अतएव भगवान्‌ये उनका स्पष्टीकरण करवानेकी और अपने लिये निश्चित श्रेयःसाधन जाननेकी इच्छाये अर्जुन पूछते हैं-- अजुन उवाच ज्यायसी चेत्‌ कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्‌ कि कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव,अर्जुन बोले--हे जनार्दन! यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्ममें क्यों लगाते हैं?

arjuna uvāca

jyāyasī cet karmaṇas te matā buddhir janārdana |

tat kiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśava ||

อรชุนกล่าวว่า “โอ้ ชนารทนะ หากในทัศนะของพระองค์ ‘พุทธิ’ (ปัญญา/ญาณ) ประเสริฐกว่ากรรมแล้ว ไฉนเล่า โอ้ เกศวะ พระองค์จึงทรงเร้าให้ข้าพเจ้ากระทำกรรมอันน่าสะพรึงนี้—ศึกสงคราม?”

अर्जुनःArjuna
अर्जुनः:
Karta
TypeNoun
Rootअर्जुन
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid/spoke
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect (Paroksha-bhuta), Third, Singular, Parasmaipada
ज्यायसीsuperior/greater
ज्यायसी:
TypeAdjective
Rootज्यायस्
FormFeminine, Nominative, Singular, Comparative
चेत्if
चेत्:
TypeIndeclinable
Rootचेत्
कर्मणःthan action (from action)
कर्मणः:
Apadana
TypeNoun
Rootकर्मन्
FormNeuter, Ablative, Singular
तेyour (to you)
ते:
TypePronoun
Rootयुष्मद्
FormSecond, Genitive, Singular
मताconsidered/held (as)
मता:
TypeAdjective
Rootमन्
Formक्त (kta), Feminine, Nominative, Singular
बुद्धिःunderstanding/wisdom
बुद्धिः:
Karta
TypeNoun
Rootबुद्धि
FormFeminine, Nominative, Singular
जनार्दनO Janardana
जनार्दन:
TypeNoun
Rootजनार्दन
FormMasculine, Vocative, Singular
तत्then/that
तत्:
TypePronoun
Rootतद्
FormNeuter, Nominative, Singular
किम्why?/what?
किम्:
TypePronoun
Rootकिम्
FormNeuter, Accusative, Singular
कर्मणिin action
कर्मणि:
Adhikarana
TypeNoun
Rootकर्मन्
FormNeuter, Locative, Singular
घोरेterrible/dreadful
घोरे:
TypeAdjective
Rootघोर
FormNeuter, Locative, Singular
माम्me
माम्:
Karma
TypePronoun
Rootअस्मद्
FormFirst, Accusative, Singular
नियोजयसिyou engage/appoint (me)
नियोजयसि:
TypeVerb
Rootयुज्
FormPresent, Indicative, Second, Singular, Parasmaipada, नि
केशवO Keshava
केशव:
TypeNoun
Rootकेशव
FormMasculine, Vocative, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna
K
Krishna (Janārdana, Keśava)

Educational Q&A

Arjuna highlights an apparent tension in Kṛṣṇa’s instruction: if discerning knowledge is higher than action, why should one undertake fearful, morally weighty action like war? The verse sets up the need to reconcile jñāna (insight) with karma (duty), leading into the teaching of disciplined, desireless action (karma-yoga).

After hearing Kṛṣṇa praise steadied wisdom and inner knowledge, Arjuna remains uncertain about his immediate duty on the battlefield. He directly questions Kṛṣṇa, asking why he is being pushed toward the terrible act of fighting if knowledge is deemed superior.