भीष्म-पर्व अध्याय १०० — त्रिगर्त-आक्रमण, भीष्म-केन्द्रित पुनर्संयोजन, तथा शक्त्यस्त्र-विनिमय
अरजोअम्बरसंवीत: सिंहखेलगतिर्नुप । शुशुभे विमलार्चिष्मान् नभसीव दिवाकर:,राजन! उसके सारे अंग निर्मल वस्त्रसे ढके हुए थे। वह सिंहके समान मस्तानी चालसे चलता था और अपनी निर्मल प्रभाके कारण आकाशगमें प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान शोभा पा रहा था
arajo’mbara-saṁvītaḥ siṁha-khela-gatir nṛpa | śuśubhe vimalārcīṣmān nabhasīva divākaraḥ ||
ข้าแต่ราชัน! กายทั้งสิ้นของเขาถูกคลุมด้วยอาภรณ์อันผุดผ่องไร้ธุลี เขาย่างก้าวด้วยลีลาสิงห์อันองอาจดุจเล่น และด้วยรัศมีอันบริสุทธิ์ก็รุ่งโรจน์ประหนึ่งสุริยันส่องสว่างอยู่กลางนภา
कर्ण उवाच