भीष्म-पर्व अध्याय १०० — त्रिगर्त-आक्रमण, भीष्म-केन्द्रित पुनर्संयोजन, तथा शक्त्यस्त्र-विनिमय
अंगदी बद्धमुकुटो हस्ताभरणवान् नृप । धार्तराष्ट्री महाराज विबभौ स पथि व्रजन्,नरेश्वर! महाराज! माथेपर मुकुट, भुजाओंमें अंगद तथा हाथोंमें वलय आदि आभूषण धारण किये मार्गपर जाता हुआ आपका पुत्र दुर्योधन बड़ी शोभा पा रहा था
aṅgadī baddha-mukuṭo hastābharaṇa-vān nṛpa | dhārtarāṣṭrī mahārāja vibabhau sa pathi vrajan ||
ข้าแต่นเรศวร มหาราช! โอรสแห่งธฤตราษฏระของท่านคือทุรโยธนะ เมื่อสวมมกุฎผูกแน่น มีอังกทที่ต้นแขน และประดับกำไลเครื่องอลังการที่มือ ครั้นยาตราไปตามทางก็รุ่งเรืองยิ่งนัก
कर्ण उवाच