Marutta’s Sacrifice: Indra’s Threat, Saṃvarta’s Mantric Restraint, and Divine Reconciliation (अध्याय १०)
संवर्त उवाच अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन् देवै: सर्वैस्त्वरितै: स्तूयमान: । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम्,(तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा--राजन! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं। मैंने मनत्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है। देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है
Saṁvarta uvāca: ayam indro haribhir āyāti rājan devaiḥ sarvais tvaritaiḥ stūyamānaḥ | mantrāhūto yajñam imaṁ mayādya paśyāsainaṁ mantravistrastakāyam ||
สัมวรตะกล่าวว่า “โอ ราชา! นี่ไง พระอินทร์เสด็จมาโดยมีม้าสีทองลากราชรถ และเทพทั้งปวงต่างเร่งรุดสรรเสริญพระองค์ ข้าได้อัญเชิญพระองค์มายัญพิธีนี้ด้วยมนตร์ในวันนี้ จงดูเถิด—ด้วยอานุภาพแห่งมนตร์ แม้พระวรกายของพระองค์ก็ประหนึ่งถูกบังคับและถูกดึงเข้ามาสู่พิธีกรรมนี้”
संवर्त उवाच