Aṣṭāvakra–Strī-saṃvāda: Dhṛti, hospitality, and a dispute on autonomy
न च दहान्ति गच्छन्त्य: सुतप्तैरपि पांसुभि: । “कामसे प्रेरित हुई नारियाँ सदा अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती हैं। कामसे संतप्त होनेपर वे तपी हुई धूलमें भी चलती हैं; परंतु इससे उनके पैर नहीं जलते हैं” || ८७ >॥ अष्टावक्र उवाच परदारानहं भद्रे न गच्छेयं कथंचन
अष्टावक्र उवाच