Śatarudrīya-prabhāva and Rudra’s Supremacy (शतरुद्रीयप्रभावः)
क्यों आपके ललाटमें तीसरा नेत्र प्रकट हुआ? किसलिये आपने पक्षियों और वनोंसहित पर्वतको दग्ध किया और देव! फिर किसलिये आपने उसे पूर्वावस्थामें ला दिया। मेरे इन पिताको आपने जो पूर्ववत् वृक्षोंसे आच्छादित कर दिया, इसका क्या कारण है? ।। (एष मे संशयो देव हृदि मे सम्प्रवर्तते । देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमरहसि ।। देवदेव! मेरे हृदयमें यह संदेह विद्यमान है। आप इसका समाधान करनेकी कृपा करें। आपको मेरा सादर नमस्कार है ।। नारद उवाच एवमुक्तस्तथा देव्या प्रीयमाणो<ब्रवीद् भव: ।।) नारदजी कहते हैं--देवी पार्ववीके ऐसा कहने-पर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले ।। श्रीमहेश्वर उवाच (स्थाने संशयितु देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणी ।। त्वदते मां हि वै प्रष्टं न शक््यं केनचित प्रिये । श्रीमहेश्वरने कहा--धर्मको जानने तथा प्रिय वचन बोलनेवाली देवि! तुमने जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है। प्रिये! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ।। प्रकाशं यदि वा गुह्ां प्रियार्थ प्रब्रवीम्पहम् ।। शृणु तत् सर्वमखिलमस्यां संसदि भामिनी । भामिनि! प्रकट या गुप्त जो भी बात होगी, तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं सब कुछ बताऊँगा। तुम इस सभामें मुझसे सारी बातें सुनो ।। सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये ।। मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि | स््रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद् विद्धि भामिनि ।। प्रिये! सभी लोकोंमें मुझे कूटस्थ समझो। तीनों लोक मेरे अधीन हैं। ये जैसे भगवान् विष्णुके अधीन हैं, उसी प्रकार मेरे भी अधीन हैं। भामिनि! तुम यही जान लो कि भगवान् विष्णु जगतके स्रष्टा हैं और मैं इसकी रक्षा करनेवाला हूँ ।। तस्माद् यदा मां स्पृशति शुभं वा यदि वेतरत् । तथैवेदं जगत् सर्व तत्तद् भवति शोभने ।।) शोभने! इसीलिये जब मुझसे शुभ या अशुभका स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत् वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है ।। नेत्रे मे संवृते देवि त्वया बाल्यादनिन्दिते । नष्टालोकस्तदा लोक: क्षणेन समपद्यत,देवि! अनिन्दिते! तुमने अपने भोलेपनके कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं। इससे क्षणभरमें समस्त संसारका प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया
śrīmaheśvara uvāca |
sthāne saṁśayitu devi dharmajñe priyabhāṣiṇī |
tvadṛte māṁ hi vai praṣṭuṁ na śakyaṁ kenacit priye ||
prakāśaṁ yadi vā guhyaṁ priyārthaṁ prabravīmy aham |
śṛṇu tat sarvam akhilam asyāṁ saṁsadi bhāmini ||
sarveṣām eva lokānāṁ kūṭasthaṁ viddhi māṁ priye |
madadhīnāstrayo lokā yathā viṣṇau tathā mayi |
sraṣṭā viṣṇur ahaṁ goptā ity etad viddhi bhāmini ||
tasmād yadā māṁ spṛśati śubhaṁ vā yadi vetarat |
tathaivedaṁ jagat sarvaṁ tattad bhavati śobhane ||
netre me saṁvṛte devi tvayā bālyād anindite |
naṣṭālokaḥ tadā lokaḥ kṣaṇena samapadyata ||
พระศรีมหेशวรตรัสว่า “โอ้เทวี ผู้รู้ธรรมและผู้มีวาจาอ่อนหวาน ความสงสัยของเจ้านั้นสมควรแล้ว ที่รักเอ๋ย นอกจากเจ้าแล้วไม่มีผู้ใดจะกล้าถามเราเช่นนี้ ไม่ว่าเรื่องนั้นจะเปิดเผยหรือเร้นลับ เราจักกล่าวทั้งหมดเพื่อความพอใจของเจ้า; โอ้ผู้รุ่งเรือง จงฟังให้สิ้นเชิงในที่ประชุมนี้ จงรู้เราเถิดว่าเป็นฐานอันไม่หวั่นไหวของสรรพโลก ทั้งสามโลกอยู่ในอำนาจของเรา ดังที่อยู่ในอำนาจของวิษณุ จงเข้าใจเถิด โอ้ผู้เลอโฉม—วิษณุเป็นผู้สร้าง ส่วนเราเป็นผู้พิทักษ์ เพราะฉะนั้น เมื่อสิ่งมงคลหรืออัปมงคลมากระทบเรา จักรวาลทั้งปวงก็เป็นไปตามนั้น โอ้เทวีผู้ไร้มลทิน เมื่อเจ้าในความไร้เดียงสาได้ปิดดวงตาทั้งสองของเรา โลกทั้งโลกก็ตกสู่ความมืดในบัดดล แสงสว่างสูญสิ้นในชั่วขณะเดียว”
श्रीमहेश्वर उवाच
The passage frames Śiva as the steady cosmic ground and protector: the universe mirrors the state that ‘touches’ the divine—auspiciousness or its opposite. It also articulates a complementary theology: Viṣṇu as creator and Śiva as guardian, emphasizing cosmic interdependence and responsibility.
In response to Devī’s doubt, Śiva affirms that her question is appropriate and uniquely intimate. He then explains that when she playfully closed his eyes, the world instantly lost its light—setting up the mythic rationale for subsequent events (such as the manifestation of another source of light/vision).