Ahiṃsā as Threefold Restraint (Mind–Speech–Action) and the Ethics of Consumption
ततो<स्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् | देवता: पञ्चभूतस्था: कि भूयः श्रोतुमिच्छसि,इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?
tato 'sya karma paśyanti śubhaṃ vā yadi vāśubham | devatāḥ pañcabhūtasthāḥ kiṃ bhūyaḥ śrotum icchasi |
แล้วเทพผู้สถิตในมหาภูตทั้งห้าย่อมพิจารณากรรมของเขา—จะเป็นกุศลหรืออกุศลก็ตาม เจ้าปรารถนาจะฟังสิ่งใดอีก?
युधिछिर उवाच