आदि पर्व — अध्याय ८३: ययाति-इन्द्र-संवादः तथा अष्टक-प्रश्नः
Yayāti–Indra Dialogue and Aṣṭaka’s Inquiry
अभिकामा स्त्रियं यश्न गम्यां रहसि याचित: । नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते बुध:,ययाति बोले--भगवन्! दानवराजकी पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी; अतः मैंने धर्म-सम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचारसे नहीं। ब्रह्मन! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतुकी याचना करनेवाली स्त्रीको ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी दविद्वानोंद्वारा भ्रूणहत्या करनेवाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामनासे युक्त गम्या स्त्रीके द्वारा एकान्तमें प्रार्थना करनेपर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्म-शास्त्रमें विद्वानोंद्वारा गर्भकी हत्या करनेवाला बताया जाता है
abhikāmāṁ striyaṁ yaś ca gamyāṁ rahasi yācitaḥ | nopaiti sa ca dharmeṣu bhrūṇahety ucyate budhaiḥ ||
ศุกระกล่าวว่า “หากสตรีผู้ควรเข้าหาได้ มีความใคร่แล้วขอเป็นการลับ แต่บุรุษไม่เข้าไปหา ในหลักธรรมบัณฑิตย่อมเรียกเขาว่า ‘ผู้ฆ่าตัวอ่อน’”
शुक्र उवाच