Ādi Parva, Adhyāya 47 — Janamejaya’s Sarpa-satra: Vow, Preparation, and the Onset of the Serpent Offering
धैर्यमालम्ब्य वामोरु्दयेन प्रवेपता । न मामहसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम्,उनके ऐसा कहनेपर अनिन््द्य सुन्दरी जरत्कारु भाईके कार्यकी चिन्ता और पतिके वियोगजनित शोकमें डूब गयी। उसका मुँह सूख गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये और हृदय काँपने लगा। फिर किसी प्रकार धैर्य धारण करके सुन्दर जाँघों और मनोहर शरीरवाली वह नागकन्या हाथ जोड़ गदगद वाणीमें जरत्कारु मुनिसे बोली--'धर्मज्ञ! आप सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। मैं भी पत्नी-धर्ममें स्थित तथा आप प्रियतमके हितमें लगी रहनेवाली हूँ। आपको मुझ निरपराध अबलाका त्याग नहीं करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठ! मेरे भाईने जिस उद्देश्यको लेकर आपके साथ मेरा विवाह किया था, मैं मन्दरभागिनी अबतक उसे पा न सकी। नागराज वासुकि मुझसे क्या कहेंगे? साधुशिरोमणे! मेरे कुटुम्बीजन माताके शापसे दबे हुए हैं। उन्हें मेरे द्वारा आपसे एक संतानकी प्राप्ति अभीष्ट थी, किंतु उसका भी अबतक दर्शन नहीं हुआ। आपसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाय तो उसके द्वारा मेरे जाति-भाइयोंका कल्याण हो सकता है
dhairyam ālambya vāmoru hṛdayena pravepatā | na mām arhasi dharmajña parityaktum anāgasam ||
นางฝืนตั้งใจมั่น กัญญาผู้มีต้นขางาม—หัวใจสั่นไหว—กล่าวว่า: “ข้าแต่ผู้รู้ธรรม ท่านไม่ควรทอดทิ้งข้าพเจ้า ผู้ไร้ความผิด.”
तक्षक उवाच
A dharmic person should not abandon the blameless; ethical conduct is measured by protection of the innocent and fidelity to rightful duty rather than by impulse.
The wife, distressed and trembling, gathers composure and pleads with the dharma-knowing sage not to forsake her, emphasizing her innocence and appealing to his commitment to dharma.