कद्रू-इन्द्र-स्तुतिः तथा नागानां तापनिवृत्तिः
Kadrū’s Hymn to Indra and the Nāgas’ Distress
वडवामुखदीप्ताग्नेस्तोयहव्यप्रदं शिवम् । अगाधपारं विस्तीर्णमप्रमेयं सरित्पतिम्,बड़वानलके प्रज्वलित मुखमें वह सदा अपने जलरूपी हविष्यकी आहुति देता रहता है और जगत्के लिये कल्याणकारी है। इस प्रकार वह सरिताओंका स्वामी समुद्र अगाध, अपार, विस्तृत और अप्रमेय है
เขาถวายน้ำเป็นเครื่องบูชาอยู่เนืองนิตย์ลงสู่ปากเพลิงวฑวามุขที่ลุกโชติช่วง และยังเป็นมงคลแก่โลก; มหาสมุทรผู้เป็นเจ้าแห่งสายน้ำทั้งหลายล้ำลึกไร้ก้น ไร้ฝั่ง กว้างใหญ่ และมิอาจประมาณได้
शौनक उवाच