आदि पर्व — अध्याय १०६
Pāṇḍu’s Gifts, Forest Residence, and Vidura’s Marriage
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं) #फशा न () आफ अत+- > यहाँ गुणवानका अर्थ है--नियोगकी विधिको जाननेवाला संयमी पुरुष। मनु महाराजने स्त्रियोंके आपद्धर्मके प्रसंगमें लिखा है-- विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि । एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथंचन ।। (मनुस्मृति ९।६१) विधवा स्त्रीके साथ सहवासके लिये (पतिपक्षके गुरुजनोंद्वारा) नियुक्त पुरुष अपने सारे शरीरपर घी चुपड़कर (सौन्दर्य बिगाड़कर), वाणीको संयममें रखकर (चुपचाप रहकर) रात्रिमें सहवास करे। इस प्रकार वह एक ही पुत्र उत्पन्न करे, दूसरा कभी न करे। विधवायां नियोगार्थे निर्वुत्ते तु यथाविधि । गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् |। (मनुस्मृति ९।६३) विधवामें नियोगके लिये विधिके अनुसार (अर्थात् कामवश न होकर कर्तव्य बुद्धिसे) चित्तको संयमित और इन्द्रियोंको अनासक्त रखते हुए नियोगका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर दोनों परस्पर पिता और पुत्रवधूके समान बर्ताव करें (अर्थात् स्त्री उसको पिताके समान समझकर बरते और पुरुष उसे पुत्रवधूके समान मानकर बर्ताव करे)। कलियुगमें मनुष्योंक असंयमी और कामी होनेके कारण नियोग वर्जित है। पञ्चाधिकशततमोब< ध्याय: व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति वैशम्पायन उवाच ततः सत्यवती काले वधू स्नातामृतौ तदा । संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर सत्यवती ठीक समयपर अपनी ऋतुस्नाता पुत्रवधूको शय्यापर बैठाती हुई धीरेसे बोली--
vaiśampāyana uvāca |
tataḥ satyavatī kāle vadhūṃ snātām ṛtau tadā |
saṃveśayantī śayane śanair vacanam abravīt ||
ไวศัมปายนะกล่าวว่า ครั้นแล้วในกาลอันเหมาะสม สัตยวตีให้บุตรสะใภ้ผู้ได้อาบน้ำหลังเข้าสู่ฤดูเจริญพันธุ์นั่งลงบนที่นอน แล้วกล่าวอย่างแผ่วเบาว่า—
वैशम्पायन उवाच
The verse frames a dharma-driven decision: intimate acts may be approached as regulated duty for preserving lineage (niyoga), emphasizing restraint, propriety, and intention rather than personal desire.
Satyavatī prepares her daughter-in-law, who is in her fertile period, and gently begins to speak—setting up the request that will lead to Vyāsa being invited to beget heirs for the Kuru line.