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Shloka 23

युधिष्ठिरस्य अर्जुनप्रेषण-युक्तिवर्णनम् | Yudhiṣṭhira’s Rationale for Sending Arjuna and Request to Dhaumya

आसप्तमं कुलं चैव पुनीते नात्र संशय: । राजन! उन्होंने ही अपने नामसे विख्यात पुण्य तीर्थकी स्थापना की है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य धर्मशील एवं एकाग्रचित्त होता है और अपने कुलकी सातवीं पीढ़ीतकके लोगोंको पवित्र कर देता है; इसमें संशय नहीं है,मनसा प्रार्थितान्‌ कार्माॉल्ल भते नात्र संशय: । भारत! उस समय संतुष्टचित्त त्रिपुरारि शिवने श्रीविष्णुसे कहा--'श्रीकृष्ण! तुम मुझे लोकमें अत्यन्त प्रिय होओगे। संसारमें सर्वत्र तुम्हारी ही प्रधानता होगी, इसमें संशय नहीं है।' राजेन्द्र! उस तीर्थमें जाकर भगवान्‌ शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है। वहाँसे मनुष्य धूमावतीतीर्थको जार और तीन रात उपवास करे। इससे वह निः:संदेह मनोवाजञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है || २०-- २२३ || देव्यास्तु दक्षिणार्थेन रथावर्तो नराधिप नरेश्वर! देवीसे दक्षिणार्ध भागमें रथावर्त नामक तीर्थ है। धर्मज्ञ! जो श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थकी यात्रा करता है, वह महादेवजीके प्रसादसे परम गति प्राप्त कर लेता है

āsaptamaṁ kulaṁ caiva punīte nātra saṁśayaḥ |

ఇది తన వంశంలోని ఏడవ తరము వరకు కూడా పవిత్రం చేస్తుంది—ఇందులో సందేహం లేదు.

up to
:
TypeIndeclinable
Root
सप्तमम्the seventh
सप्तमम्:
TypeAdjective
Rootसप्तम
FormNeuter, Accusative, Singular
कुलम्family, lineage
कुलम्:
Karma
TypeNoun
Rootकुल
FormNeuter, Accusative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
एवindeed, certainly
एव:
TypeIndeclinable
Rootएव
पुनीतेpurifies
पुनीते:
TypeVerb
Rootपू
FormPresent, Third, Singular, Atmanepada
not
:
TypeIndeclinable
Root
अत्रhere, in this matter
अत्र:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootअत्र
संशयःdoubt
संशयः:
Karta
TypeNoun
Rootसंशय
FormMasculine, Nominative, Singular

घुलस्त्य उवाच

K
kula (lineage)