विदुर-धृतराष्ट्रसंवादः
Vidura–Dhṛtarāṣṭra Dialogue on Rajadharma and Restitution
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेयो धृतराष्ट्र: परैति । यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जल न तिषछेत् पथ्यमुक्ते तथास्मिन्,राजन! राजा धृतराष्ट्र कल्याणकारी उपाय नहीं ग्रहण करते हैं, अत: यह निश्चय जान पड़ता है कि कौरवकुलका विनाश अवश्यम्भावी है। जैसे कमलके पत्तेपर डाला हुआ जल नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार कही हुई हितकर बात राजा धृतराष्ट्रके मनमें स्थान नहीं पाती है
dhruvaṁ vināśo nṛpa kauravāṇāṁ na vai śreyo dhṛtarāṣṭraḥ paraiti | yathā ca parṇe puṣkarasyāvasiktaṁ jalaṁ na tiṣṭhet pathyam ukte tathāsmin, rājan |
రాజా! ధృతరాష్ట్రుడు శ్రేయస్కరమైన ఉపాయాన్ని స్వీకరించడు; అందువల్ల కౌరవుల వినాశం నిశ్చితం. కమలపత్రంపై పోసిన నీరు నిలవనట్లే, పథ్యమైన హితవాక్యం ధృతరాష్ట్రుని మనసులో నిలవదు.
विदुर उवाच