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Shloka 15

आरण्यकपर्वणि अध्यायः २१६ — इन्द्र-स्कन्द-संमुखता वज्रप्रहारश्च

Indra approaches Skanda; vajra strike and the arising of Viśākha

एको नरसहस्रेषु धर्मविद्‌ विद्यते न वा । प्रीतो5स्मि तव सत्येन भद्र| ते पुरुषर्षभ,हजारों मनुष्योंमेंसे कोई एक भी धर्मके तत्त्वको जाननेवाला है या नहीं--यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। पुरुषर्षभ! आपका कल्याण हो। आज मैं आपके सत्यके कारण आपपर बहुत प्रसन्न हूँ

వేల మందిలో ధర్మతత్త్వాన్ని తెలిసినవాడు ఒక్కడైనా ఉన్నాడో లేదో—నిశ్చయంగా చెప్పలేం. పురుషర్షభా! నీకు మంగళం కలుగుగాక. నేడు నీ సత్యవచనమువల్ల నేను నీపై ఎంతో ప్రసన్నుడను.

ब्राह्मण उवाच