Āraṇyaka-parva, Adhyāya 1 — The Pandavas’ Exit from Gajasāhvaya and the Citizens’ Lament (जनमेजयप्रश्नः; पाण्डवानां वनप्रस्थानम्)
निरारम्भा हापि वयं पुण्यशीलेषु साधुषु । पुण्यमेवाप्रुयामेह पापं पापोपसेवनात्,“जिन पुरुषोंके विद्या, जाति और कर्म--ये तीनों उज्ज्वल हों, उनका सेवन करना चाहिये; क्योंकि उन महापुरुषोंके साथ बैठना शास्त्रोंके स्वाध्यायसे भी बढ़कर है। हमलोग अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान नहीं करते, तो भी पुण्यात्मा साधुपुरुषोंके समुदायमें रहनेसे हमें पुण्यकी ही प्राप्ति होगी। इसी प्रकार पापीजनोंके सेवनसे हम पापके ही भागी होंगे
nirārambhā api vayaṁ puṇyaśīleṣu sādhuṣu | puṇyam evāpnuyāma iha pāpaṁ pāpopasevanāt ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—మేము యజ్ఞాదికర్మారంభములు చేయకపోయినను, పుణ్యశీల సాధుజనుల మధ్య నివసించినచో ఇహలోకమందే పుణ్యమే పొందుదుము. అలాగే పాపుల సహవాసముచేత మనుష్యుడు పాపమునకు భాగస్వామి అవుతాడు.
वैशम्पायन उवाच