कृष्णेन विदुरं प्रति आगमन-हेतु-निवेदनम् / Krishna explains the purpose of his coming to Vidura
'शत्रुसूदन! जहाँ दुष्टतापूर्ण विचार लिये बहुसंख्यक शत्रु बैठे हों, वहाँ उनके बीच आप कैसे जाना चाहते हैं? शत्रुहन्ता महाबाहु श्रीकृष्ण! यद्यपि सम्पूर्ण देवता भी सर्वधा आपके सामने टिक नहीं सकते हैं तथा आपका जो प्रभाव, पुरुषार्थ और बुद्धिबल है, उसे भी मैं जानता हूँ; तथापि माधव! पाण्डवोंपर जो मेरा प्रेम है, वही और उससे भी बढ़कर आपके प्रति है। अत: प्रेम, अधिक आदर और सौहार्दसे प्रेरित होकर मैं यह बात कह रहा हूँ ।। २७ --२९ || या मे प्रीति: पुष्कराक्ष त्वद्दर्शनसमुद्धवा । सा किमाख्यायते तुभ्यमन्तरात्मासि देहिनाम्
yā me prītiḥ puṣkarākṣa tvaddarśana-samudbhavā | sā kim ākhyāyate tubhyam antarātmāsi dehinām ||
వైశంపాయనుడు పలికెను— ఓ పుష్కరాక్షా! నిన్ను దర్శించిన వెంటనే నాలో ఉద్భవించే ప్రేమను నీకు ఎలా వర్ణించగలను? నీవు సమస్త దేహధారుల అంతరాత్మవు.
वैशम्पायन उवाच