Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
शल्यने कहा--युधिष्ठिर! नहुषसे ऐसा कहकर उस समय सब देवता ऋषियोंके साथ इन्द्राणीसे यह अशुभ वचन कहनेके लिये बृहस्पतिजीके पास गये ।। जानीम: शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि । दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम,उन्होंने कहा--'देवर्षिप्रवर! विप्रेन्द्र! हमें पता लगा है कि इन्द्राणी आपकी शरणमें आयी हैं और आपके ही भवनमें रह रही हैं। आपने उन्हें अभय-दान दे रखा है
jānīmaḥ śaraṇaṃ prāptām indrāṇīṃ tava veśmani | dattābhayāṃ ca viprendra tvayā devarṣi-sattama ||
వారు అన్నారు—ఓ దేవర్షిశ్రేష్ఠా, ఓ విప్రేంద్రా! ఇంద్రాణి నీ శరణు కోరుకొని నీ గృహంలోనే నివసిస్తున్నదని మాకు తెలిసింది; ఓ ఉత్తమ ఋషీ, నీవు ఆమెకు అభయదానం (రక్షణ) ఇచ్చావు.
शल्य उवाच