राजधर्मस्य नवनीतम्—रक्षा, दण्ड, चार, उत्थान
Rājadharma’s ‘Essence’: Protection, Punishment, Intelligence, and Royal Diligence
/ - यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना 'सन्धि' नामक गुण है। यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना '“विग्रह” है। यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदिपर जो आक्रमण किया जाता है, उसे “यान” कहते हैं। यदि अपने ऊपर शत्रुकी ओरसे आक्रमण हो और शत्रुका पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है, वह “आसन” कहलाता है। यदि चढ़ाई करनेवाला शत्रु मध्यम श्रेणीका हो तो 'द्वैधीभाव” का सहारा लिया जाता है। उसमें ऊपरसे दूसरा भाव दिखाया जाता है और भीतर दूसरा ही भाव रखा जाता है। जैसे आधी सेना दुर्गमें रखकर आत्मरक्षा करना और आधीको भेजकर शत्रुओंके अन्न आदि सामग्रीपर कब्जा करना आदि कार्य 'द्वैधीभाव” नीतिके अन्तर्गत हैं। आक्रमणकारीसे पीड़ित होनेपर किसी मित्र राजाका सहारा लेकर उसके साथ लड़ाई छेड़ना 'समाश्रय” कहलाता है। - मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग (किला), खजाना और दण्ड--ये पाँच “प्रकृति” कहे गये हैं। ये ही अपने और शत्रुपक्षके मिलाकर “दशवर्ग” कहलाते हैं, यदि दोनोंके मन्त्री आदि समान हों तो ये स्थानके हेतु होते हैं। अर्थात् दोनों पक्षकी स्थिति कायम रहती है, अगर अपने पक्षमें इनकी अधिकता हो तो ये वृद्धिके साधक होते हैं और कमी हो तो क्षयके कारण बनते हैं। अष्टपञज्चाशत्तमो< ध्याय: भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके 48 8 कक आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान- सं नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश भीष्म उवाच एतत् ते राजधर्माणां नवनीतं युधिष्ठिर । बृहस्पति्हिं भगवान् न्याय्यं धर्म प्रशंसति,भीष्मजी कहते हैं--युधष्ठिर! यह मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, राजधर्मरूपी दूधका माखन है। भगवान् बृहस्पति इस न्यायानुकूल धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं
bhīṣma uvāca | etat te rājadharmāṇāṃ navanītaṃ yudhiṣṭhira | bṛhaspatir hi bhagavān nyāyyaṃ dharmaṃ praśaṃsati ||
భీష్ముడు పలికెను—యుధిష్ఠిరా, నేను నీకు వివరించినది రాజధర్మమనే పాలలోని నెయ్యి వంటిది—అత్యుత్తమ సారం. స్వయంగా భగవాన్ బృహస్పతి కూడా న్యాయసమ్మతమైన, నీతియుక్తమైన ఈ ధర్మాన్నే ప్రశంసిస్తాడు.
भीष्म उवाच
Bhishma frames his counsel on kingship as the distilled essence of rajadharma and validates it by invoking Brihaspati, an authoritative teacher of dharma and statecraft, emphasizing that sound governance must align with justice (nyaya).
In the Shanti Parva’s instruction to Yudhishthira after the war, Bhishma concludes or seals a section of royal counsel by declaring it the ‘butter’ (essence) of kingly duty and citing Brihaspati’s approval of such just dharma.