Prāyaścitta-vidhāna: Tapas, Dāna, Vrata, and Proportional Expiation (प्रायश्चित्तविधानम्)
देवस्थानाभिगमनमाज्यप्राशनमेव च । एतानि मेध्यं पुरुष कुर्वन्त्याशु न संशय:,“जिनके दोषोंका विशेषरूपसे उल्लेख नहीं हुआ है, ऐसे कर्म बन जानेपर उनके दोषके निवारणके लिये जप, होम, उपवास, आत्मज्ञान, पवित्र नदियोंमें स्नान तथा जहाँ जप-होम आदियें तत्पर रहनेवाले बहुत-से पुण्यात्मा पुरुष रहते हों, उस स्थानका सेवन--ये सामान्य प्रायश्चित्त हैं। ये सारे कर्म पुण्यदायक हैं। पर्वत, सुवर्णप्राशन (सोनेसे स्पर्श कराये हुए जलका पान), रत्न आदिसे मिश्रित जलमें स्नान, देव-स्थानोंकी यात्रा और घृतपान--ये सब मनुष्यको शीघ्र ही पवित्र कर देते हैं, इसमें संशय नहीं है
devasthānābhigamanam ājyaprāśanam eva ca | etāni medhyaṁ puruṣa kurvanty āśu na saṁśayaḥ ||
వ్యాసుడు పలికెను—దేవస్థాన దర్శనం మరియు ఘృతప్రాశనం—ఈ కర్మలు మనిషిని త్వరగా పవిత్రునిగా చేస్తాయి; ఇందులో సందేహం లేదు.
व्यास उवाच