एकान्तिधर्म-प्रश्नः (Inquiry into Ekāntin Dharma) / The Origin and Practice of Single-Pointed Nārāyaṇa-Centered Discipline
सप्त प्रकृतयो होतास्तथा स्वायम्भुवोडष्टम: । एताभिर्धार्यते लोकस्ताभ्य: शास्त्र विनि:सृतम्,ये सातों ऋषि प्रकृतिके सात रूप हैं अर्थात् प्रजाके स्रष्टा हैं। आठवाँ ब्रह्मा है। ये सब मिलकर इस सम्पूर्ण जगतको धारण करते हैं। इन्हींके द्वारा शास्त्रका प्राकट्य हुआ है। ये सब-के-सब ऋषि एकाग्रचित्त, जितेन्द्रिय, संयमपरायण, भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता तथा सत्य-धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं
saptaprakṛtayo hotās tathā svāyambhuvo ’ṣṭamaḥ | etābhir dhāryate lokas tābhyaḥ śāstra-viniḥsṛtam ||
భీష్ముడు పలికెను—ఏడు ప్రకృతులు ఉన్నాయి; ఎనిమిదవది స్వయంభువు (బ్రహ్మ). వీటివలననే లోకం ధారణ చేయబడుతుంది; వీటినుండే శాస్త్రము ప్రవర్తించింది.
भीष्म उवाच