परिव्राजक-आचारः (Conduct of the Wandering Renunciant) — Mahābhārata, Śānti-parva 269
एकत्वेन पृथक्त्वेन विशेषो नात्र दृश्यते । तद् यथावद् यथान्यायं भगवान् प्रब्रवीतु मे,स्यूमरश्मिने पूछा--भगवन्! आप तो ज्ञाननिष्ठ हैं और गृहस्थलोग कर्मनिष्ठ होते हैं; परंतु आप इस समय निष्ठामें सभी आश्रमोंकी एकताका प्रतिपादन कर रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्मकी एकता और पृथकृता-दोनोंका भ्रम होनेसे इनका ठीक-ठीक अन्तर समझमें नहीं आता है। इसलिये आप मुझे उसे यथोचित एवं यथार्थरीतिसे बतानेकी कृपा करें
ekatvena pṛthaktvena viśeṣo nātra dṛśyate | tad yathāvad yathānyāyaṁ bhagavān prabravītu me |
కపిలుడు పలికెను—ఏకత్వముగా చూచినను, భిన్నత్వముగా చూచినను, ఇక్కడ నిజమైన భేదము కనబడదు. కావున భగవన్! యథావిధిగా, న్యాయానుసారముగా నాకు వివరించండి.
कपिल उवाच