Kośa-saṃjanana and Subtle Dharma
Treasury Formation and Fine-Grained Ethics
#द5>2/5-> (9) शीला - यथा--ुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथं प्रतिपन्नस्य कार्य भवति शासनम् || अर्थात् घमंडमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करते हुए कुमार्गपर चलनेवाले गुरुको भी दण्ड देना आवश्यक है। त्रयस्त्रिशर्दाधिकशततमोब& ध्याय: राजाके लिये कोशसंग्रहकी आवश्यकता, मर्यादाकी स्थापना और अमर्यादित दस्युवृत्तिकी निन््दा भीष्म उवाच स्वराष्ट्रात् परराष्ट्राच्च कोशं संजनयेन्नूप: । कोशाद्ि धर्म: कौन्तेय राज्यमूलं च वर्धते,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि! राजाको चाहिये कि वह अपने तथा शत्रुके राज्यसे धन लेकर खजानेको भरे। कोशसे ही धर्मकी वृद्धि होती है और राज्यकी जड़ें बढ़ती अर्थात् सुदृढ़ होती हैं
bhīṣma uvāca | svarāṣṭrāt pararāṣṭrāc ca kośaṃ saṃjanayen nṛpaḥ | kośād dhi dharmaḥ kaunteya rājyamūlaṃ ca vardhate ||
భీష్ముడు పలికెను—అహంకారంతో కర్తవ్యాకర్తవ్యాలను గ్రహించక కుపథంలో నడిచే గురువుకూడా శిక్ష అవసరమే. ఓ కుంతీపుత్రా, రాజు తన రాజ్యంనుండి మరియు శత్రురాజ్యంనుండికూడా ఆదాయాన్ని సమీకరించి కోశాన్ని (ఖజానాను) పెంపొందించాలి; ఎందుకంటే కోశం వల్లనే ధర్మం నిలిచి విస్తరిస్తుంది, రాజ్యపు మూలాలు బలపడతాయి.
भीष्म उवाच