शल्यस्य सेनापत्याभ्युपगमः | Śalya’s Acceptance of Command
न ध्रुवं सुखमस्तीति कुतो राष्ट्र कुतो यश: । इह कीर्तिविधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा,'संसारमें कोई भी सुख सदा रहनेवाला नहीं है। फिर राष्ट्र और यश भी कैसे स्थिर रह सकते हैं? यहाँ तो कीर्तिका ही उपार्जन करना चाहिये और कीर्ति युद्धके सिवा किसी दूसरे उपायसे नहीं मिल सकती
లోకంలో ఏ సుఖమూ శాశ్వతం కాదు; అట్లుంటే రాజ్యమూ యశస్సూ ఎలా స్థిరంగా ఉంటాయి? ఇక్కడ సంపాదించవలసింది కీర్తియే; కీర్తి యుద్ధం తప్ప మరే మార్గంతో లభించదు।
संजय उवाच