Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
अवादयन् पारिषदा: प्रह्ृष्ा: कनकप्रभा: । गायमानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथा परे,कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे
avādayan pāriṣadāḥ prahṛṣṭāḥ kanakaprabhaḥ | gāyamānās tathaivānye nṛtyamānās tathā pare ||
సంజయుడు అన్నాడు—హర్షంతో ఉల్లసించి, స్వర్ణప్రభతో ద్యోతించే ఆ పరిషదులు వాద్యములను మ్రోగించిరి. కొందరు పాడిరి, మరికొందరు నర్తించిరి.
संजय उवाच