अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विमुक्तकवचा विभो । विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतस:,प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्रिन्त हो मुर्दोके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा
adya svapsyanti pañcālā vimuktakavacā vibho | viśvastā rajanīṁ sarve pretā iva vicetasaḥ ||
కృపుడు అన్నాడు—ఓ మహాబలవంతుడా! ఈ రాత్రి పాంచాలులు కవచాలు విప్పి నిద్రిస్తారు. అందరూ నమ్మకంతో, నిర్భయంగా, రాత్రంతా మృతులవలె చైతన్యరహితులై పడివుంటారు.
कृप उवाच