अर्जुनस्योत्तरदिग्विजयः
Arjuna’s Northern Conquests and Tribute Collection
न स सज्ज ति वृक्षेषु शस्त्रैश्वापि न रिष्यते । दिव्यो ध्वजवरो राजन दृश्यते चेह मानुषै:,अब वह उत्तम ध्वज सहस्रों किरणोंसे आवृत मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति अपने तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा। प्राणियोंक लिये उसकी ओर देखना कठिन हो गया। वह वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं था, अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा कटता नहीं था। राजन्! वह दिव्य और श्रेष्ठ ध्वज इस लोकके मनुष्योंको दृष्टिगोचर मात्र होता था
na sa sajjati vṛkṣeṣu śastraiś cāpi na riṣyate | divyo dhvajavaro rājan dṛśyate ceha mānuṣaiḥ ||
వైశంపాయనుడు పలికెను—ఆ ధ్వజము వృక్షములలో ఎక్కడా చిక్కదు; ఆయుధములచేత కూడ హానికలుగదు. ఓ రాజా! ఆ దివ్యమైన, శ్రేష్ఠమైన ధ్వజము ఈ లోకమున మనుష్యులకు ఇక్కడ దర్శనమాత్రముగా కనిపించుచున్నది.
वैशम्पायन उवाच