Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
बभूव प्रथमो राजन् संग्रामस्तारकामय: । राजन! देवताओं और असुरोंमें परस्पर विजय पानेकी इच्छासे सर्वप्रथम तारकामय संग्राम हुआ था ।। निर्जिताश्व तदा दैत्या दैवतैरिति न: श्रुतम्,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे
duryodhana uvāca | babhūva prathamo rājan saṅgrāmas tārakāmayaḥ | nirjitāśva tadā daityā daivatair iti naḥ śrutam | nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā |
దుర్యోధనుడు అన్నాడు—ఓ రాజా, దేవతలకూ అసురులకూ పరస్పర విజయం పొందాలనే కోరికతోనే మొదటగా ‘తారకామయ’ అనే మహాసంగ్రామం జరిగింది. ఆ సంగ్రామంలో దైత్యులు దేవతల చేత ఓడిపోయారని మేము విన్నాము. కాబట్టి స్థిరమనస్సుతో వినుము; ఇందులో సందేహమో అధిక విచారణయో అవసరం లేదు.
दुर्योधन उवाच
Duryodhana invokes ancient precedent to steady the listener’s mind and discourage hesitation: in war and politics, narratives of earlier victories and defeats are used to shape resolve and suppress doubt.
Addressing the Madra king (Śalya), Duryodhana begins recounting an old devasura conflict called the Tārakāmaya war, emphasizing that the Daityas were defeated by the gods, and urges Śalya to listen without second-guessing.