धृष्टद्युम्नस्य द्रोणाभिमुख्यं तथा सात्यकि-कर्ण-समागमः
Dhṛṣṭadyumna’s advance toward Droṇa and the Sātyaki–Karṇa confrontation
अस्मदर्थ च युध्यन्तं त्यक्त्वा प्राणान् सुदुस्त्यजान् । मम बाहुं रणे राजन् दक्षिण युद्धदुर्मदम्,(निकृष्यमाणं तं दृष्टवा कथं शत्रुवशं गतम् । त्वया विकृष्यमाणं च दृष्टवानस्मि निष्क्रियम् ।।) सात्यकि मेरा शिष्य और सुखप्रद सम्बन्धी है। वह मेरे ही लिये अपने दुस्त्यज प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध कर रहा है। राजन! रणदुर्मद सात्यकि युद्धस्थलमें मेरी दाहिनी भुजाके समान है। उसे तुम्हारे द्वारा कष्ट पाते देख मैं कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता था। मैंने देखा है तुम उसे घसीट रहे थे और वह शत्रुके अधीन होकर निश्चेष्ट हो गया था
asmadarthaṃ ca yudhyantaṃ tyaktvā prāṇān sudustyajān | mama bāhuṃ raṇe rājan dakṣiṇaṃ yuddhadurmadam || (nikṛṣyamāṇaṃ taṃ dṛṣṭvā kathaṃ śatruvaśaṃ gatam | tvayā vikṛṣyamāṇaṃ ca dṛṣṭavānasmi niṣkriyam ||)
అర్జునుడు అన్నాడు— నా కోసమే సాత్యకి, విడిచిపెట్టడం అత్యంత కష్టమైన ప్రాణాసక్తినికూడా త్యజించి యుద్ధం చేస్తున్నాడు. రాజా, రణోన్మాదంలో అతడు యుద్ధభూమిలో నా కుడి భుజంలాంటివాడు. నీవు అతడిని లాగుతూ, శత్రువశమై నిశ్చేష్టుడై పడిపోయినట్లు చూసి, అతని బాధను నేను ఎలా ఉపేక్షించగలను?
अर्जुन उवाच