Adhyāya 140: Rātriyuddhe Droṇa-prāpti-prayatnaḥ
Night engagement and the attempt to reach Droṇa
शतध्नीभिश्च चित्राभिर्बभौ भारत मेदिनी । भारत! उस समय अनुकर्ष, पताका, हाथी, घोड़े, रथ, आभूषण, टूटकर बिखरे हुए स्यन्दन (रथ), टूक-टूक हुए पहिये, धुरी और कूबर, सुवर्णभूषित एवं महान् टंकार शब्द करनेवाले धनुष, सोनेके पंखवाले बाण, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोके समान कर्ण और भीमसेनके छोड़े हुए सहस्रों नाराच, प्रास, तोमर, खड्ग, फरसे, सोनेकी गदा, मुसल, पट्टिश, भाँति-भाँतिके ध्वज, शक्ति, परिघ और विचित्र शतघ्नी आदिसे उस रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी || १७--२० ह || कनकाज्दहारैश्व कुण्डलैर्मुकुटैस्तथा
sañjaya uvāca |
śatadhnībhiś ca citrābhir babhau bhārata medinī |
సంజయుడు పలికెను—ఓ భారతా! ఆ సమయంలో విచిత్ర శతఘ్నీలతో నిండిన ఆ భూమి (రణభూమి) అపూర్వంగా ప్రకాశించెను।
संजय उवाच